नशे के कारोबार से जुड़े आरोपी को झटका, हाईकोर्ट ने दूसरी जमानत याचिका भी ठुकराई

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बिलासपुर। नशीली दवाओं की अवैध तस्करी और उसे वित्तीय सहायता प्रदान करने के मामले में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच ने उत्तर छत्तीसगढ़ सरगुजा के अंबिकापुर थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में आरोपी जगदीश उर्फ विराट की दूसरी नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, यूपीआई लेन-देन यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि याचिकाकर्ता इस नेटवर्क को वित्तीय ऑक्सीजन दे रहा था। ऐसे में NDPS एक्ट की धारा 37 के तहत जमानत पर पूर्ण विधिक प्रतिबंध लागू होता है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, प्रतिबंधित दवाओं की ‘कमर्शियल क्वांटिटी’ से जुड़े मामलों में सह-आरोपी के खाते में यूपीआई के जरिए किया गया संदिग्ध वित्तीय लेनदेन आरोपी की संलिप्तता को दर्शाता है, ऐसे में एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के कड़े प्रावधानों के तहत राहत नहीं दी जा सकती।

सरगुजा जिले के थाना अंबिकापुर में दर्ज एनडीपीएस एक्ट के तहत अपराध से जुड़ा मामला है। पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर कार्रवाई करते हुए सह-आरोपियों को घेराबंदी कर पकड़ा था। आरोपियों के कब्जे से पुलिस ने कोडीन फॉस्फेट युक्त ‘WNGS RX’ कफ सिरप की 100-100 एमएल की 108 बोतलें और बुप्रेनॉर्फिन के 2-2 एमएल के 100 नग इंजेक्शन जब्त किया था।

पुलिस जांच के दौरान तकनीकी साक्ष्यों से खुलासा हुआ, आवेदक जगदीश उर्फ विराट ने अपने मोबाइल से यूपीआई UPI के जरिए 25 हजार रुपये की राशि एक सह-आरोपी के बैंक खाते में ट्रांसफर की थी। पुलिस ने इस वित्तीय लेनदेन को नशीली दवाओं के अवैध कारोबार की फंडिंग और आपराधिक साजिश का हिस्सा मानते हुए जगदीश को 21 मई 2025 को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किा था। कोट के आदेश पर ज्यूडिशियल रिमांड पर जेल भेज दिया है। बता दें, इसके पहले छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को पहली जमानत याचिका को खारिज कर दिया था।

आरोपी जगदीश ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS की धारा 483 के तहत छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में दूसरी जमानत याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, याचिकाकर्ता के पास से सीधेतौर पर किसी भी प्रकार का नशीला पदार्थ या प्रतिबंधित सामग्री बरामद नहीं हुई है। अधिवक्ता ने कहा, सह-आरोपी अनिल गुप्ता उर्फ बाबू गुप्ता की चिकन की दुकान, याचिकाकर्ता की दुकान के बगल में ही है। 17 फरवरी 2025 को अनिल ने यूपीआई काम न करने की बात कहकर मदद मांगी थी, जिस पर आवेदक ने मानवता के नाते ₹25 हजार ररुपये ट्रांसफर किया था। आवेदक को इस बात की भनक तक नहीं थी कि इन पैसों का इस्तेमाल किसी अवैध गतिविधि के लिए होना है। अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, याचिकाकर्ता बीते एक साल से जेल में बंद है। मामले के 13 गवाहों में से अब तक केवल 6 गवाहों के बयान दर्ज हो सके हैं, जिससे ट्रायल पूरा होने में लंबा समय लगने की आशंका है।

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए पैनल लॉयर शुभम वाजपेयी ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा, मामला बेहद गंभीर और संगठित ड्रग नेटवर्क से जुड़ा है। जब्त की गई नशीली दवाएं ‘कमर्शियल क्वांटिटी’ के दायरे में आती हैं। यूपीआई लेन-देन यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि याचिकाकर्ता इस नेटवर्क को वित्तीय ऑक्सीजन दे रहा था। ऐसे में NDPS एक्ट की धारा 37 के तहत जमानत पर पूर्ण विधिक प्रतिबंध लागू होता है।

जमानत याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने केस डायरी और डिजिटल साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद माना, याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई नई या असाधारण परिस्थितियां मौजूद नहीं हैं, जिसके आधार पर कोर्ट अपना पिछला रुख बदले।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यह मामला नशीली दवाओं के अवैध व्यापार के एक संगठित नेटवर्क और उसकी वित्तीय सहायता से संबंधित है। जब्त सामग्री की मात्रा व्यावसायिक है, जो समाज और युवा पीढ़ी के लिए अत्यंत घातक है। विवेचना के दौरान सह-आरोपी के खाते में यूपीआई के माध्यम से 25 हजार रुपये ट्रांसफर होने के तथ्य सामने आए हैं, जो इस अपराध में याचिकाकर्ता की सक्रिय भागीदारी और वित्तीय सहायता की ओर इशारा करते हैं। पूर्व में पहली जमानत याचिका खारिज होने और एनडीपीएस एक्ट की विधिक कठोरता को देखते हुए, यह कोर्ट दूसरी जमानत अर्जी स्वीकार करने का कोई आधार नहीं पाता है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह छूट दी है, मामले की गंभीरता को देखते हुए इस मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाए और इसे जल्द से जल्द अंतिम फैसले तक पहुंचाए।