नाबालिग को कार चलाने की इजाजत देना पड़ सकता है भारी, जानिए क्या हो सकते हैं कानूनी नतीजे
बिलासपुर। सड़क हादसे में 3 लोगों की मौत के मामले में नाबालिग बेटी को वाहन की चाबी देने वाले पिता की याचिका को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने आरोपी पिता घनश्याम महिलाने (निवासी धरमजयगढ़, रायगढ़) के खिलाफ दर्ज एफआईआर FIR, चार्जशीट और निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान को निरस्त करने से इंकार कर दिया है।
घटना 30 अक्टूबर 2025 की है। छत्तीसगढ़ रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ थाना क्षेत्र अंतर्गत कापू रोड स्थित छला मोड़ खमहार के पास एक दर्दनाक सड़क हादसा हुआ, जिसमें कार की चपेट में आने से 3 लोगों की मौत हो गई थी। इसमें एक महिला और दो पुरुष शामिल हैं। पुलिस जांच में यह बात सामने आई, दुर्घटना के समय कार को आरोपी घनश्याम महिलाने की नाबालिग बेटी लापरवाहीपूर्वक चला रही थी। पिता को पुलिस ने सह आरोपी बनाया है। पुलिस का कहना है, यह जानते हुए भी कि बेटी नाबालिग है, कार की चाबी सौंपने और उसे गाड़ी चलाने की अनुमति देना खतरनाक हो सकता है। पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 105 (सदोष मानव वध जो हत्या नहीं है) व धारा 3(5) और मोटर व्हीकल एक्ट (MV Act) की धारा 199A, 184, 3/181 व 4/181 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया है।
याचिकाकर्ता घनश्याम महिलाने ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और आरोप पत्र को रद्द करने की मांग करते हुए छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता कीओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता विकास कुमार पांडेय ने कहा, याचिकाकर्ता न तो वाहन का पंजीकृत मालिक है और न ही दुर्घटना के समय गाड़ी चला रहा था। अधिवक्ता पांडेय ने घटना स्थल के पास के एक रेस्टोरेंट में लगे CCTV कैमरे के फूटेज और फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया, घटना के समय गाड़ी नाबालिग बेटी नहीं, बल्कि अभिषेक भास्कर नामक बालिग व्यक्ति चला रहा था और बेटी बगल की सीट पर बैठी थी। अधिवक्ता ने कहा, याचिकाकर्ता शासकीय कर्मचारी है और एकतरफा जांच के कारण उसके करियर पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, इसलिए उसके खिलाफ पूरी कार्यवाही निरस्त की जाए।
मामले की सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट साक्ष्यों का परीक्षण या मिनी ट्रायल नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा, याचिकाकर्ता द्वारा पेश किया गया सीसीटीवी फूटेज और फॉरेंसिक रिपोर्ट उसके बचाव का हिस्सा है। इनकी प्रामाणिकता और सत्यता का फैसला निचली अदालत में ट्रायल के दौरान ही हो सकता है।
डिवीजन बेंच ने कहा, पुलिस चार्जशीट में स्पष्ट आरोप है, पिता ने जानते-समझते हुए, नाबालिग को चाबी सौंपी थी। प्रथम दृष्टया अपराध की सामग्री मौजूद होने के कारण कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के संज्ञान लेने के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ता को छूट दी है कि वह अपनी सभी दलीलें ट्रायल कोर्ट के समक्ष रख सकता है।