हाई कोर्ट ने डॉक्टर को दी राहत, कहा- केवल सोनोग्राफी जांच के आधार पर POCSO केस नहीं बनता

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई काेर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने राजनादगांव की एमडी, रेडियोलाजिस्ट डा. आरती उइके के खिलाफ दर्ज पाक्सो एक्ट के तहत आपराधिक मामले और पुलिस की पूरक चार्जशीट को रद्द कर दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, यदि किसी डॉक्टर को अपराध की जानकारी नहीं दी गई है, तो सिर्फ सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया के तहत सोनोग्राफी करने पर उनके खिलाफ पाक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती।

12 फरवरी 2025 को छत्तीसगढ़ राजनादगांव जिले में एक पारिवारिक कार्यक्रम के दौरान 15 वर्षीय किशोरी अपने ही स्कूल के एक नाबालिग छात्र के संपर्क में आई, जिससे वह गर्भवती हो गई। गर्भावस्था का पता चलने पर परिजन उसे सोनोग्राफी के लिए राजनादगांव डायग्नोस्टिक सेंटर व अस्पताल ले गए। डॉ. आरती उइके ने किशोरी की जांच की। बाद में किशोरी ने बच्चे को जन्म दिया और सह-आरोपियों की मदद से उसे गोद दे दिया गया। 31 दिसंबर 2025 को पीड़िता की मां ने पुलिस चौकी चिचोला में शिकायत दर्ज कराई। इसके आधार पर पुलिस ने जीरो में एफआईआर दर्ज कर, 1 जनवरी 2026 को मामला थाना बोरतलाव स्थानांतरित कर दिया। जांच के दौरान पुलिस ने आरोप लगाया कि डॉ. आरती उइके ने नाबालिग की गर्भावस्था की सूचना पुलिस को नहीं दी। इसी आधार पर 8 मार्च 2026 को उन्हें पॉक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत गिरफ्तार कर लिया। चिकित्सक को जमानत मिलने के बाद पुलिस ने 10 मार्च 2026 को पूरक चालान पेश किया, जिस पर 11 मार्च 2026 को अपर सत्र न्यायाधीश, डोंगरगढ़ ने संज्ञान लिया। इसके बाद डॉ. उइके ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आपराधिक कार्रवाई को चुनौती दी थी।

याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता चिकित्सक की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, याचिकाकर्ता ने पीसी-पीएनडीटी एक्ट के तहत सभी वैधानिक औपचारिकताएं पूरी की। इस दौरान पीड़िता या उसके परिजनों ने उन्हें किसी यौन अपराध की जानकारी नहीं दी। इसलिए केवल सोनोग्राफी करने पर पाक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती। राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता कार्यालय के अधिवक्ता ने कहा, नाबालिग की गर्भावस्था की जानकारी मिलने पर डॉक्टर का पुलिस को सूचित करना कानूनी दायित्व था।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, पाक्सो एक्ट की धारा 19 के तहत सूचना देने का दायित्व तभी बनता है, जब डाक्टर को अपराध की जानकारी या आशंका हो। डिवीजन बेंच ने आपराधिक मामले और पुलिस की पूरक चार्जशीट को रद्द कर दिया है।

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