POCSO मामले में हाई कोर्ट की दो टूक: घटना के समय शिकायकर्ता नाबालिग थी, शादी कर लेने से अपराध की गंभीरता कम नहीं होगी

बिलासपुर : बिलासपुर हाई कोर्ट में एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। पहले तो नाबालिग शिकायकर्ता ने अपने प्रेमी के खिलाफ शादी का वादा कर दुष्कर्म करने और फिर शादी से इंकार करने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस ने एफआईआर कर पॉक्साे कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दिया। परिस्थितियां बदलने के साथ ही गलतफहमी दूर हुई और दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द करने की मांग की। हाई कोर्ट ने कहा, पूर्व में किए गए अपराध से बच नहीं सकते। पॉक्सो का अपराध शादी कर लेने से कम नहीं होगा।
नाबालिग से संबंध और शादी का झांसा देने के आरोप में दर्ज मामले में आरोपी युवक को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि यदि अपराध उस समय का है, जब शिकायतकर्ता नाबालिग थी, तो बाद में दोनों की शादी हो जाना और साथ रहना पोक्सो अपराध को समाप्त नहीं करता। कोर्ट ने एफआईआर, चार्जशीट और संज्ञान आदेश रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
छत्तीसगढ़ जांजगीर-चांपा निवासी नवल किशोर आदित्य के खिलाफ महिला थाने में 22 अप्रैल 2026 को अपराध दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि वह वर्ष 2011 से आरोपी के संपर्क में थी और आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। परिवार की वजह बताकर वह शादी टालता रहा।
इसी बीच दोनों ने 20 अप्रैल 2026 को शादी कर ली और पति-पत्नी के रूप में रहने लगे। शिकायतकर्ता का बयान 24 अप्रैल को न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुआ। इसमें उसने कहा कि दोनों के बीच लंबे समय से संबंध थे, शादी में देरी पारिवारिक कारणों से हुई। शिकायत गलतफहमी में की गई थी। शिकायकर्ता जो अब आरोपी की पत्नी है, उसने पति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं चाहने की बात भी कही। इसके बावजूद जांच के बाद पुलिस ने 16 जून 2026 को चार्जशीट पेश कर दी। 19 जून को विशेष पोक्सो अदालत ने मामले में संज्ञान ले लिया।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि दोनों लंबे समय से संबंध में थे और अंततः शादी भी कर ली। इसलिए शुरुआत से शादी करने का झूठा इरादा होने का आरोप नहीं बनता। शिकायतकर्ता ने भी मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत को गलतफहमी का परिणाम बताया है और कहा,अब कार्रवाई नहीं चाहती। दलील दी गई कि बाद में शादी में देरी को अपने आप शादी का झूठा वादा नहीं माना जा सकता। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रमोद सूर्यभान पवार और नईम अहमद सहित अन्य फैसलों का हवाला दिया गया।
राज्य शासन की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा, दोनों के बीच संबंध उस समय शुरू हुआ, जब शिकायतकर्ता नाबालिग थी। इसलिए बाद में हुई शादी, समझौता या वर्तमान में पति-पत्नी के रूप में रहना पोक्सो कानून के तहत कथित अपराध को खत्म नहीं कर सकता।
याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। कोर्ट ने कहा, एफआईआर में लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया स्वीकार करने पर संज्ञेय अपराध बनता है। जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है। ऐसे में याचिकाकर्ता का यह कहना कि संबंध सहमति से था, शिकायत गलतफहमी में हुई और बाद में शादी होने से आरोप समाप्त हो गए, ये सभी तथ्य और साक्ष्य से जुड़े विवादित प्रश्न है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, मामले में शिकायतकर्ता के नाबालिग होने की अवधि से जुड़े आरोप है। इसलिए पोक्सो कानून के प्रावधानों की प्रयोज्यता का फैसला रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल में होगा।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, बाद में हुई शादी और दोनों का साथ रहना मामले की परिस्थितियों में प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन इन परिस्थितियों के आधार पर अपराध को प्रारंभिक स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने एफआईआर, चार्जशीट, संज्ञान आदेश और आगे की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी है।