दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: CBI के 6 अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करने के निर्देश, छत्तीसगढ़ के इंटेलिजेंस चीफ अमित कुमार भी शामिल

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के छह अधिकारियों के खिलाफ कथित तौर पर अदालत के समक्ष गलत जानकारी प्रस्तुत करने के मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। इन अधिकारियों में छत्तीसगढ़ के इंटेलिजेंस चीफ अमित कुमार भी शामिल हैं। अदालत ने संबंधित विशेष न्यायाधीश को शिकायत चार सप्ताह के भीतर सक्षम मजिस्ट्रेट के पास भेजने का निर्देश दिया है। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस आदेश का मतलब अधिकारियों को दोषी ठहराना नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मोहम्मद आजाद के नाम शामिल हैं। इनमें विनीत विनायक, अमित कुमार और प्रेम कुमार गौतम भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी हैं। अमित कुमार वर्तमान में छत्तीसगढ़ में इंटेलिजेंस चीफ के पद पर कार्यरत हैं। संबंधित घटनाक्रम के समय वह CBI में डीआईजी थे।
जस्टिस मधु जैन ने 6 अक्टूबर 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों, विभागीय फाइल नोटिंग और जवाब के विभिन्न मसौदों से मामले की जांच के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया आधार सामने आता है। अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 191, 193 और 209 के तहत कथित अपराधों के संबंध में लिखित शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया। ये धाराएं झूठे साक्ष्य देने, झूठे साक्ष्य गढ़ने और अदालत में बेईमानी से झूठा दावा करने जैसे अपराधों से संबंधित हैं।
यह पूरा मामला पूर्व भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के कथित मामले से संबंधित है। CBI ने उनके खिलाफ कार्रवाई की थी, लेकिन जनवरी 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके अभियोजन की मंजूरी को अवैध ठहरा दिया था। इसके बाद मार्च 2016 में विशेष अदालत ने उन्हें आरोपमुक्त कर दिया।
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के प्रस्ताव पर CBI के भीतर विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान कानून एवं न्याय मंत्रालय ने 8 जून 2016 को अपनी राय में कहा कि मामले को उच्चतर अदालत में ले जाने के लिए पर्याप्त आधार दिखाई नहीं देता। इसके बाद कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 1 जुलाई 2016 को यह राय CBI को भेज दी।
बाद में अशोक कुमार अग्रवाल ने जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेज लौटाने की मांग की। इसी सिलसिले में CBI ने 2 अगस्त 2016 को अदालत में अपना जवाब दाखिल किया। इसी जवाब में किए गए कथनों और उनके पीछे की विभागीय प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आया।
हाईकोर्ट के समक्ष प्रमुख सवाल यह था कि CBI ने अदालत को सरकारी मंत्रालय के साथ आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर पत्राचार जारी होने की जानकारी क्यों दी, जबकि विभागीय रिकॉर्ड से अलग स्थिति सामने आती थी।
अदालत ने जवाब के अलग-अलग मसौदों और संबंधित फाइलों की जांच की। शुरुआती मसौदे में कहा गया था कि DoPT ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। हालांकि, बाद के मसौदे में यह कथन हटा दिया गया और हाथ से लिखकर यह उल्लेख किया गया कि प्रशासनिक मंत्रालय के साथ पत्राचार जारी है।
हाईकोर्ट के अनुसार, उस समय के रिकॉर्ड से मंत्रालय के साथ ऐसे किसी पत्राचार की पुष्टि नहीं होती थी। इसके बजाय CBI के भीतर प्रस्ताव पर दोबारा विचार करने और आगे की कानूनी राय लेने की प्रक्रिया चल रही थी।
अदालत ने मसौदे में हुए इस बदलाव को केवल शब्दों के चयन से जुड़ी सामान्य त्रुटि मानने से इनकार कर दिया। उसके मुताबिक, उपलब्ध दस्तावेज यह जांचने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं कि अदालत के समक्ष वास्तविक स्थिति किस तरह प्रस्तुत की गई और इसमें संबंधित अधिकारियों की क्या भूमिका रही।
हाईकोर्ट ने जवाब तैयार करने, उसमें संशोधन करने, उसकी समीक्षा करने, मंजूरी देने और अदालत में दाखिल करने की प्रक्रिया में छहों अधिकारियों की भूमिका पर विचार किया। फाइल नोटिंग और जवाब के विभिन्न मसौदों से इस प्रक्रिया में उनके अलग-अलग स्तर पर शामिल होने के संकेत मिले।
अदालत ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि CBI ने 9 अगस्त 2016 को बाद में एक और जवाब दाखिल किया था। इसके साथ ही यह सवाल भी उठाया गया कि क्या कथित गलत बयान से अशोक कुमार अग्रवाल को वास्तविक नुकसान हुआ था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन पहलुओं को आपराधिक शिकायत की प्रक्रिया रोकने का पर्याप्त आधार नहीं माना।
अदालत ने कहा कि मामला केवल किसी पक्ष के दावे को साबित करने में असफल रहने तक सीमित नहीं है। यह न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और अदालत के सामने सही तथ्य रखने की जिम्मेदारी से भी जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश, CBI-02, राउज एवेन्यू कोर्ट को छह अधिकारियों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कर उसे आदेश की प्रति प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के पास भेजने का निर्देश दिया है। अदालत के मुताबिक, उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे की कार्रवाई के लिए अलग से प्रारंभिक जांच कराना आवश्यक नहीं है।
हालांकि, इस आदेश से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी छह अधिकारी दोषी हैं। उनकी जानकारी, मंशा, व्यक्तिगत भूमिका और आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण सक्षम अदालत में होने वाली कार्यवाही के दौरान किया जाएगा।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें देश की प्रमुख जांच एजेंसी के अधिकारियों द्वारा अदालत में प्रस्तुत जवाब की सत्यता पर सवाल उठे हैं। हाईकोर्ट के निर्देश को न्यायिक प्रक्रिया में तथ्यों की शुद्धता और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही के लिहाज से अहम घटनाक्रम माना जा रहा है।
