पोला पर्व और कुशोत्पाटिनी अमावस्या: मिट्टी के बैल की पूजा के साथ साल भर के पूजन के लिये आज होती है कुशा एकत्र
पोला पर्व| आज पोला पर्व है. पोला पर्व (पोरा तिहार) पूरे छत्तीसगढ़ में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. पोला पर्व भाद्रपद (भादो) माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है, जो इस बार 23 अगस्त को मनाई जा रही है. छत्तीसगढ़ के इस पारंपरिक त्योहार में कृषि कार्यों में लगे बैलों की पूजा का विधान है. इस दिन किसान कृषि कार्यों से विरत रहते हैं, और बैलों को नहलाकर उसे सजाकर पूजा करते हैं. घरों में मिट्टी, लकड़ी या पीतल के बने बैलों की पूजा करते हैं, जिन्हें बच्चे खेलते हैं. इस अवसर पर ठेठरी-खुरमी और अईरसा जैसे पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं.
इस दिन को कुशोत्पाटिनी अमावस्या के रूप में भी मनाया जाता है. कुशा उखाड़कर घर लाने की प्रथा को कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन किया जाता है, जो साल में एक बार आती है. इसलिए इस दिन को कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है. इस दिन साल भर के धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पवित्र कुशा एकत्र की जाती है और इसे उखाड़ते समय ‘ॐ हूं फट’ मंत्र का उच्चारण किया जाता है.
मान्यता है की अमावस्या की तिथि पितरों की आत्म शांति, दान-पुण्य और के लिए विशेष रूप से महत्व रखती है। इस अमावस्या को पुरोहित धार्मिक कार्यों के लिये कुशा उखाड़ कर एकत्रित करते हैं फिर घर लाते हैं कहा जाता है कि धार्मिक कार्यों, श्राद्ध कर्म आदि में इस्तेमाल की जाने वाली कुशा यदि इस दिन एकत्रित की जाये तो वह पुण्य फलदायी होती है इसलिए इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है| शनिवार को पड़ने के कारण शनि देव की भिनपूजा की जाती है, साथ ही अमावस्या तिथि पितरों की भी तिथि मानी जाती है. जिन्हें शनि दोष हो वे शनि देव को सरसों तेल, काला तिल, आदि अर्पण करे पितृ दोष वाले काले तिल दूध में मिलकर पीपल वृक्ष में पितरों के निमित्त चढ़ाएं.
मिट्टी के बैल और खिलौने की पूजा
पोला पर्व में मिट्टी से बने खिलौने और बैल की पूजा करने के बाद मिट्टी के बने बैल को बच्चे दौड़ाते हैं. उसके बाद शाम को पोरा (मिटटी के बर्तन पटकने) की रस्म घर की बेटी करती हैं. जिसे तुलसी के पेड़ के पास या फिर गांव में कहीं जहाँ मेले का आयोजन होता है उस स्थल में एक जगह बनाई जाती है वहां की जाती है.