रिट कोर्ट ने साफ किया रुख, काल्पनिक याचिकाओं पर नहीं होगी सुनवाई; स्टे खत्म, याचिका खारिज

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने रिट याचिका की सुनवाई के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने कहा है, रिट न्यायालय सामान्यतः काल्पनिक या प्रत्याशित कारणों पर आधारित याचिकाओं पर विचार नहीं करता। वास्तविक या तत्काल खतरे में पड़े किसी भी कारण का अस्तित्व इस न्यायालय के असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने के लिए अनिवार्य शर्त है। वर्तमान मामले में, न केवल किसी औपचारिक नोटिस या आदेश का अभाव है, बल्कि नगर निगम की कथित कार्रवाइयां भी याचिकाकर्ता के किसी भी कानूनी अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन नहीं करती हैं।

याचिकाकर्ता मुरारी लाल गुप्ता ने अधिवक्ता अच्युत तिवारी के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। दायर याचिका में कहा है, उसकी खसरा नंबर 1033/5 वाली 1100 वर्ग फुट भूमि का वैध स्वामी और स्थायी कब्जेदार है, जिसमें से 880 वर्ग फुट विधिवत विवेचित भूमि है, जो मंगला, जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में स्थित है, और उसने अपनी भूमि की सीमाओं के भीतर ही निर्माण किया है। उसने उक्त भूमि पर दुकानें बना ली है और कई वर्षों से अपना व्यवसाय चला रहा है। वह नियमित रूप से सभी आवश्यक नगरपालिका करों और अन्य देय राशियों का भुगतान सक्षम अधिकारियों को करता आ रहा है।

याचिका के अनुसार वर्तमान विवाद की जड़ वर्ष 2004 की प्रस्तावित सड़क विकास योजना में निहित है, जिसमें मंगला-भैंसाझार सड़क के विकास का उल्लेख किया गया था। हालांकि, काफी समय बीत जाने के बावजूद, न तो कोई वैध अधिग्रहण कार्यवाही शुरू की गई है और न ही कानून के अनुसार कोई सीमांकन किया गया है, जिससे यह सिद्ध हो सके, याचिकाकर्ता की भूमि प्रस्तावित सड़क के मार्ग में आती है। इसके अभाव में, नगर निगम व जिला प्रशासन द्वारा की गई कोई भी दंडात्मक कार्रवाई पूरी तरह से मनमानी और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के विरुद्ध है।

याचिका के अनुसार प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्णतः उल्लंघन करते हुए, नगर निगम व जिला प्रशासन के अधिकारियों ने न तो उसे कोई नोटिस जारी किया है और न ही उसे सुनवाई का कोई अवसर दिया है। इसके विपरीत, नगर निगम के अधिकारी बार-बार स्थल का दौरा कर रहे हैं और याचिकाकर्ता तथा अन्य समान स्थिति वाले व्यक्तियों को मौखिक रूप से धमकी दे रहे हैं, वे अपने निर्माण हटा लें, अन्यथा उन्हें ध्वस्त कर दिया जाएगा। याचिका के अनुसार ऐसा आचरण न केवल मनमानी है बल्कि असंवैधानिक भी है, क्योंकि यह उचित प्रक्रिया के बिना याचिकाकर्ता को उसकी संपत्ति से वंचित करने का प्रयास करता है।

राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए पैनल लाॅयर आकांक्षा वर्मा व नगर निगम बिलासपुर के अधिवक्ता संदीप दुबे की ओर से अधिवक्ता मानस वाजपेयी ने कोर्ट को बताया, याचिकाकर्ता का पूरा मामला केवल इस निराधार आशंका पर आधारित है, अधिकारी विवादित भूमि पर बने ढांचे को ध्वस्त कर सकते हैं, जबकि वास्तव में आज तक ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई है। उन्होंने आगे कहा, याचिकाकर्ता संपत्ति पर शांतिपूर्ण कब्जा बनाए हुए है और प्रतिवादियों के किसी भी हस्तक्षेप के बिना अपना व्यवसाय चला रहा है। यह तर्क दिया गया है कि न तो कोई विध्वंस किया गया है और न ही सक्षम अधिकारियों द्वारा मंगला-भैसाझार सड़क के निर्माण या चौड़ीकरण के उद्देश्य से कथित ढांचे को हटाने के संबंध में कोई अंतिम निर्णय लिया गया है। किसी ठोस या तत्काल कार्रवाई के अभाव में, यह याचिका केवल अटकलों पर आधारित है और इसलिए कानून की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है।

नगर निगम की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता मानस वाजपेयी ने कहा, वर्तमान याचिका की स्वीकार्यता का पुरजोर विरोध किया और कहा कि यह पूरी तरह से भ्रामक, समय से पहले दायर की गई और तथ्यात्मक एवं कानूनी आधार से रहित है। उनका तर्क है, नगर निगम द्वारा याचिकाकर्ता को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया है, इसलिए जिस आधार पर यह याचिका दायर की गई है वह गलत और भ्रामक है। किसी प्रतिकूल आदेश या दंडात्मक कार्रवाई के अभाव में, याचिकाकर्ता के पास कोई भी वैध या लागू करने योग्य वाद कारण नहीं हो सकता है। याचिका मात्र आशंकाओं और काल्पनिक आरोपों पर आधारित है, जो याचिकाकर्ता को वर्तमान कार्यवाही जारी रखने का कोई अधिकार नहीं प्रदान करती हैं। अधिवक्ता ने कोर्ट से मांग की, याचिका को आरंभिक चरण में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा है, याचिका में दिए गए कथनों और अभिलेख में प्रस्तुत सामग्री का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है, इस रिट याचिका का संपूर्ण आधार याचिकाकर्ता द्वारा विवादित भूमि पर स्थित संरचना के संभावित विध्वंस के संबंध में मात्र आशंका पर टिका है। याचिका और उससे संलग्न दस्तावेजों का सावधानीपूर्वक अवलोकन करने से यह स्पष्ट नहीं होता, इस संबंध में कोई वैधानिक नोटिस, आदेश या सूचना जारी की गई है। ऐसे किसी भी साक्ष्य के अभाव में, याचिकाकर्ता का दावा, अधिकारियों के किसी निश्चित या कार्रवाई योग्य निर्णय के बजाय केवल कथित धमकियों और अनुमानों पर आधारित प्रतीत होता है।

याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, रिट न्यायालय सामान्यतः काल्पनिक या प्रत्याशित कारणों पर आधारित याचिकाओं पर विचार नहीं करता है। वास्तविक या तत्काल खतरे में पड़े किसी भी कारण का अस्तित्व इस न्यायालय के असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने के लिए अनिवार्य शर्त है। वर्तमान मामले में, न केवल किसी औपचारिक नोटिस या आदेश का अभाव है, बल्कि नगर निगम की कथित कार्रवाइयां भी याचिकाकर्ता के किसी भी कानूनी अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन नहीं करती हैं। अधिकारियों के मात्र दौरे या कथित मौखिक कथन, भले ही उन्हें सत्य मान लिया जाए, कानूनी रूप से मान्य कार्रवाई का आधार नहीं बनते हैं। इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ता द्वारा व्यक्त की गई आशंका पूर्णतः निराधार प्रतीत होती है। अतः याचिकाकर्ता ने अधिकारियों की ओर से किसी ठोस कार्रवाई की प्रतीक्षा किए बिना, अनुचित जल्दबाजी में इस न्यायालय का रुख किया प्रतीत होता है।

कोर्ट ने जारी स्टे को किया रद्द

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यह भी ध्यान देने योग्य है, यद्यपि अंतरिम संरक्षण पहले प्रदान किया गया था, ऐसा प्रतीत होता है, यह पूर्ण तथ्यात्मक आधार के अभाव में प्राप्त किया गया था। किसी भी ठोस कारण के अभाव में ऐसे संरक्षण का जारी रहना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस स्तर पर न्यायिक हस्तक्षेप प्रशासनिक कार्रवाई को पूर्वनिर्धारित करने के समान होगा, जो अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है और याचिकाकर्ता द्वारा आशंका व्यक्त किए गए तरीके से कभी उत्पन्न नहीं हो सकती है।

कोर्ट ने कहा है, वर्तमान रिट याचिका समय से पहले और योग्यताहीन है, क्योंकि इसमें रिट क्षेत्राधिकार को लागू करने के लिए आवश्यक मूलभूत कारण का अभाव है। तदनुसार, रिट याचिका खारिज की जाती है। कोर्ट ने कहा, यदि नगर निगम के अधिकारी भविष्य में याचिकाकर्ता के अधिकारों को प्रभावित करने वाली कोई कार्रवाई शुरू करते हैं, तो वह पूरी तरह से कानून के अनुसार और याचिकाकर्ता को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करने के बाद ही की जाएगी।