शिक्षक की याचिका पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, छात्रा के यौन उत्पीड़न मामले में नहीं मिली राहत…
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने स्कूली छात्राओं की सुरक्षा और उनके प्रति होने वाले अपराधों की संवेदनशीलता को देखते हुए एक सख्त आदेश पारित किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सूरजपुर जिले के एक सरकारी स्कूल के व्याख्याता हरकेश कुमार जायसवाल की याचिका को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता शिक्षक ने अपने खिलाफ POCSO एक्ट के तहत दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी। डिवीजन बेंच ने कहा है, मामला एक नाबालिग छात्रा से जुड़ा है और प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का मामला बनता है, इसलिए जांच के शुरुआती चरण में कानूनी प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।
उत्तर छत्तीसगढ़ सूरजपुर जिले के भटगांव स्थित शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से जुड़ा मामला है। याचिकाकर्ता शिक्षक, स्कूल में वर्ष 2008 से जीव विज्ञान के व्याख्याता के पद पर पदस्थ हैं। उनके खिलाफ भटगांव पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 75(1)(iii) और पॉक्सो एक्ट, 2012 POCSO एक्ट की धारा 8 के तहत एफआईआर दर्ज किया है।
पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को चुनौती देते हुए शिक्षक ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। दायर याचिका में दुर्भावनापूर्ण तरीके से शिकायत दर्ज कराने और इसी आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया है। शिक्षक ने एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता शिक्षक के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, शिक्षक बीते 17 वर्षों से सेवारत है, इसी स्कूल में उनकी पत्नी भी लेक्चरर हैं। आजतलक उनके खिलाफ किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं आई है। अधिवक्ता ने बताया, जब शिक्षक 1 अप्रैल 2026 को अपने बच्चों की नीट NEET परीक्षा की तैयारी के सिलसिले में कोटा (राजस्थान) गए हुए थे, तब उनके ही एक सहकर्मी शिक्षक ने आपसी और विभागीय रंजिश के चलते कुछ छात्रों और अभिभावकों को उनके खिलाफ भड़काकर यह झूठी शिकायत दर्ज कराई।
याचिकाकर्ता के अनुसार, कथित घटना 16 फरवरी 2026 की बताई गई है, जबकि इसकी रिपोर्ट करीब 50 दिनों के विलंब से 6 अप्रैल 2026 को दर्ज कराई गई, जो पूरी कहानी पर संदेह पैदा करती है। याचिकाकर्ता शिक्षक ने कहा, भरी क्लास में ऐसी घटना होना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए डिप्टी गर्वनमेंट एडवोकेट सौम्या राय ने कोर्ट के सामने दलील पेश करते हुए कहा, मामला एक नाबालिग छात्रा से जुड़े यौन उत्पीड़न से संबंधित है। ऐसे गंभीर मामलों में महज एफआईआर दर्ज होने में हुई देरी को आधार बनाकर पूरी कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता। सच क्या है, यह केवल पुलिस की विस्तृत और निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकता है।
मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है,नाबालिग छात्रा से जुड़े मामलों में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। ये आरोप ऐसे नहीं हैं जिन्हें इस स्तर पर पूरी तरह से बेतुका या असंभव मान लिया जाए। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ याचिका को खारिज कर दिया है। डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता शिक्षक को एक राहत देते हुए कहा, यदि उन्हें इस मामले में अपनी गिरफ्तारी की आशंका है, तो वे कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का सहारा लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।