हाई कोर्ट का फैसला: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की याचिका खारिज, कोर्ट ने कहा…

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बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सेवा नियमावली से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति या नियमितीकरण में प्रबंधन की ओर से कोई प्रक्रियात्मक चूक हुई है, तो उसकी सजा वर्षों तक ईमानदारी से सेवा देने वाले अधीनस्थ कर्मचारी को नहीं दी जा सकती।

डिवीजन बेंच ने ‘छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद’ CCOST के महानिदेशक द्वारा दायर दो रिट अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के उस आदेश को सही ठहराया है, जिसमें दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों (भृत्यों) की बर्खास्तगी को रद्द कर उन्हें बहाल करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने साफ कहा है, प्रोबेशन (परिवीक्षा अवधि) सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद कर्मचारी ‘नियमित सेवा’ का दर्जा पा लेता है, और उसे संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत सुरक्षा प्राप्त होती है।

​याचिकाकर्ता आर्यहिंद यादव और भोजेश्वर चंद्राकर को रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (डीजी-कॉस्ट) में वर्ष 2011-2012 के दौरान कलेक्टर दर पर भृत्य के पद पर नियुक्त किया गया था। बेहतर सेवाओं को देखते हुए विभाग ने वर्ष 2014 में उन्हें नियमित वेतनमान (Rs. 4700-7440 + ग्रेड पे Rs.1300) देते हुए पद पर नियमित कर दिया था।

​नियमितीकरण के बाद दोनों ने वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं। इस बीच विभाग ने उनके प्रोबेशन पीरियड को आगे बढ़ाने का कोई आदेश जारी नहीं किया। सितंबर 2020 में आदेश जारी कर दोनों की सेवाएं समाप्त कर दी गई। इसके खिलाफ दोनों कर्मचारियों ने हाई कोर्ट की सिंगल बेंच में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद सिंगल बेंच ने 15 अप्रैल 2026 को उनकी बर्खास्तगी को अवैध पाते हुए निरस्त कर दिया था। सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए परिषद ने डिवीजन बेंच के समक्ष याचिका दायर की थी।

याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। परिषद की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता डॉ. सौरभ कुमार पांडे ने कहा, कर्मचारियों की शुरुआती नियुक्ति, भर्ती नियमों के विपरीत थी। तत्कालीन महानिदेशक ने बिना सक्षम प्राधिकारी (शासी निकाय) की मंजूरी के एकतरफा इनका नियमितीकरण किया था, जो कानूनी रूप से शून्य है। चूंकि वे कभी कन्फर्म नहीं हुए थे, इसलिए उन्हें बिना विस्तृत विभागीय जांच के केवल नोटिस देकर हटाया जा सकता था।

​कर्मचारियों की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता रवि कुमार भगत और राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता पीके भादुड़ी ने पक्ष रखा। दोनों पक्षों को सुनने के बाद चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के निर्णय को बरकरार रखते हुए विभाग की अपीलों को खारिज कर दिया।

​कोर्ट ने पाया कि साल 2014 में नियमित होने के बाद तय समय सीमा में प्रोबेशन बढ़ाने का कोई प्रतिकूल आदेश रिकॉर्ड पर नहीं था। ऐसे में कानूनन यह माना जाएगा कि उन्होंने अपनी परिवीक्षा अवधि सफलतापूर्वक पूरी कर ली थी और वे नियमित कर्मचारी बन चुके थे। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, नियमित कर्मचारी को सेवा से हटाने से पहले संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत एक पूर्ण और निष्पक्ष विभागीय जांच करना अनिवार्य है। केवल स्पष्टीकरण या कारण बताओ नोटिस जारी करना जांच का विकल्प नहीं हो सकता। अदालत ने विशेष रूप से नोट किया कि कर्मचारियों पर अपनी नियुक्ति पाने के लिए किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज देने या गलत बयानी का कोई आरोप नहीं है।

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