हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: चेक बाउंस के बावजूद बीमा कंपनी को करना होगा मुआवजे का भुगतान, बीमा कंपनियों को झटका

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बिलासपुर| छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले युवक के परिजनों को बड़ी राहत देते हुए मुआवजे की राशि 47.10 लाख रुपये से बढ़ाकर 54.76 लाख रुपये कर दी है। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बीमा पॉलिसी जारी होने के बाद प्रीमियम का चेक बाउंस होने से तीसरे पक्ष के अधिकार समाप्त नहीं होते। ऐसी स्थिति में बीमा कंपनी पहले पीड़ित परिवार को भुगतान करेगी और बाद में वाहन मालिक से राशि की वसूली कर सकेगी।

मामला बिलासपुर के मगरपारा चौक निवासी चंद्रप्रकाश जांगड़े उर्फ चंचल की सड़क दुर्घटना में हुई मौत से जुड़ा है। हादसे के समय कार (CG 04 Z 4843) रायपुर निवासी रविंद्र बोथरा चला रहे थे, जबकि वाहन के मालिक चंद्रप्रकाश बोथरा थे। दुर्घटना के बाद मृतक की पत्नी ज्योति जांगड़े, पुत्र समर, पुत्री प्रणिता तथा माता-पिता सौखीलाल और सावित्री जांगड़े ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में मुआवजे का दावा प्रस्तुत किया था। अधिकरण ने 12 मार्च 2020 को 47.10 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था।

अधिकरण के आदेश से असंतुष्ट होकर मृतक के परिजनों ने मुआवजा बढ़ाने की मांग की, जबकि बीमा कंपनी ने यह कहते हुए भुगतान से इनकार कर दिया कि पॉलिसी का प्रीमियम जमा नहीं हुआ था और चेक बाउंस हो गया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि दुर्घटना की तिथि तक बीमा पॉलिसी प्रभावी थी, तो प्रीमियम का चेक बाद में बाउंस होने से तीसरे पक्ष का अधिकार प्रभावित नहीं होगा। ऐसी स्थिति में ‘पे एंड रिकवर’ का सिद्धांत लागू होगा। यानी बीमा कंपनी पहले पीड़ित परिवार को पूरी राशि का भुगतान करेगी और बाद में वाहन मालिक से उसकी वसूली कर सकती है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अधिकरण ने मृतक के व्यक्तिगत खर्च की कटौती गलत आधार पर की थी। पांच आश्रित होने के बावजूद आय में एक-तिहाई की कटौती की गई थी, जबकि नियमों के अनुसार केवल एक-चौथाई कटौती की जानी चाहिए थी। इसी त्रुटि को सुधारते हुए कोर्ट ने पुनर्गणना कर मुआवजा बढ़ाकर 54.76 लाख रुपये निर्धारित किया।

हाईकोर्ट ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश दिया है कि वह बढ़ी हुई मुआवजा राशि का भुगतान 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित 45 दिनों के भीतर पीड़ित परिवार को करे। यह फैसला सड़क दुर्घटना पीड़ितों के अधिकारों और ‘पे एंड रिकवर’ सिद्धांत को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।