छत्तीसगढ़ धान घोटाला: 250 करोड़ के चावल का हिसाब नहीं, ‘सरकारी चूहों’ पर फिर ठीकरा

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Raipur : छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान के रिकॉर्ड में एक बार फिर बड़ा अंतर सामने आया है। इस बार खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में खरीदे गए धान के भौतिक सत्यापन और रिकॉर्ड के मिलान के दौरान करीब 1.27 लाख मीट्रिक टन धान का हिसाब मेल नहीं खा रहा है। इसकी अनुमानित कीमत 250 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है। पिछले साल यह नुकसान सामने आए 500 से 600 करोड़ रुपए था। मामला फिर से सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। सवाल उठ रहा है कि इस साल फिर से सरकारी चूहे धान खा गए या सूरज ने सूखा दिया।

खाद्य विभाग और मार्कफेड के आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष प्रदेश की 2740 उपार्जन समितियों के माध्यम से 41.04 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई। इसके बाद जब धान के भौतिक सत्यापन और रिकॉर्ड का मिलान किया गया तो उपार्जन केंद्रों में करीब 72 हजार मीट्रिक टन और संग्रहण केंद्रों में करीब 55 हजार मीट्रिक टन धान का अंतर मिला। दोनों को मिलाकर कुल 1.27 लाख मीट्रिक टन धान का हिसाब स्पष्ट नहीं हो सका।

जानकारी के अनुसार 30 अप्रैल तक सभी केंद्रों से धान का शत-प्रतिशत उठाव पूरा होना था, लेकिन कई जिलों में यह प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो सकी। कई केंद्रों में अब भी धान का स्टॉक पड़ा हुआ है। अधिकारियों का कहना है कि कुछ जगहों पर उठाव के बाद ऑनलाइन रिकॉर्ड अपडेट नहीं होने के कारण भी अंतर दिखाई दे रहा है। वहीं कई स्थानों पर वास्तविक अनियमितताओं की भी जांच की जा रही है।

इस बीच खाद्य विभाग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। जहां-जहां गड़बड़ी की पुष्टि हो रही है, वहां समिति प्रबंधकों, ऑपरेटरों और अन्य कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जिन मामलों में अनियमितता साबित होगी, वहां संबंधित लोगों से नुकसान की वसूली भी की जाएगी।

मार्कफेड का कहना है कि प्रदेश के लगभग सभी उपार्जन और संग्रहण केंद्रों से धान का उठाव सुनिश्चित कर लिया गया है। अब तक 2740 में से 2385 केंद्रों का लेखा मिलान पूरा हो चुका है, जबकि 355 केंद्रों का मिलान अभी बाकी है। उनका कहना है कि शेष केंद्रों की जांच पूरी होने के बाद वास्तविक स्थिति और स्पष्ट होगी।

जिलों की बात करें तो सबसे ज्यादा लेखा मिलान कांकेर जिले में 69 केंद्रों का है। इसके अलावा कोंडागांव में 42, बस्तर में 36, बीजापुर में 23, जशपुर में 17 और अन्य जिलों में भी कुछ केंद्रों का मिलान अभी पूरा नहीं हुआ है।

रिकॉर्ड और भौतिक उपलब्धता में सबसे अधिक अंतर कांकेर और कोंडागांव जिलों में सामने आया है। उपार्जन केंद्रों के रिकॉर्ड के अनुसार कांकेर जिले में करीब 13,949 मीट्रिक टन और कोंडागांव में 7,201 मीट्रिक टन धान का मिलान नहीं हो पाया है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम लेखा मिलान पूरा होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि यह अंतर तकनीकी कारणों से है या फिर वास्तविक गड़बड़ी का मामला है। बारिश का मौसम शुरू होने से कई केंद्रों पर खुले में रखे धान के खराब होने का खतरा भी बढ़ गया है। ऐसे में समय पर उठाव और रिकॉर्ड अपडेट नहीं होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

पिछले वर्ष भी धान खरीदी के रिकॉर्ड में 500 से 600 करोड़ रुपए का अंतर सामने आया था। इस बार राशि कम जरूर है, लेकिन फिर से बड़ी मात्रा में धान का हिसाब नहीं मिलने से खरीदी व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब सभी की नजर शेष 355 केंद्रों के लेखा मिलान और जांच रिपोर्ट पर टिकी है, जिससे यह तय होगा कि यह केवल रिकॉर्ड संबंधी त्रुटि है या फिर बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका।