RTI पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: दूसरों के विवाह पंजीकरण और निजी दस्तावेजों की जानकारी साझा नहीं की जा सकती

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम और व्यक्ति की निजता के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिना किसी व्यापक जनहित के किसी व्यक्ति की निजी जानकारी तीसरे पक्ष को उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि आरटीआई का उद्देश्य शासन में पारदर्शिता लाना है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी की निजी जानकारी हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने अंबिकापुर निवासी डी.के. सोनी द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि विवाह पंजीयन आवेदन, जन्मतिथि, पहचान पत्र, पता, फोटो और अन्य व्यक्तिगत दस्तावेज निजी जानकारी की श्रेणी में आते हैं। यदि आवेदक यह साबित नहीं कर पाता कि जानकारी का संबंध किसी बड़े जनहित, भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग से है, तो ऐसी जानकारी देना व्यक्ति की निजता का अनावश्यक उल्लंघन होगा।
मामले में याचिकाकर्ता ने सूरजपुर के विशेष विवाह अधिकारी कार्यालय से दो व्यक्तियों के विवाह पंजीयन आवेदन, उससे जुड़े दस्तावेज और आदेश की प्रमाणित प्रतियां आरटीआई के तहत मांगी थीं। जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया था कि आवेदक थर्ड पार्टी है और मामला न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ा है। राज्य सूचना आयोग ने भी इस निर्णय को सही ठहराया था, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सूचना आयोग के कामकाज पर भी नाराजगी जताई। डी.के. सोनी ने एक शिकायत से संबंधित जांच रिपोर्ट और गवाहों के बयान मांगे थे, लेकिन आयोग ने सूचना देने या न देने पर फैसला करने के बजाय केवल अधिकारियों को प्रशिक्षण देने और समय-सीमा का पालन करने की सलाह देकर मामला समाप्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सूचना आयोग केवल प्रक्रियात्मक सलाह देने वाली संस्था नहीं, बल्कि अंतिम अपीलीय प्राधिकरण है। उसका दायित्व यह तय करना है कि मांगी गई सूचना कानून के तहत उपलब्ध कराई जा सकती है या नहीं। कोर्ट ने आयोग का आदेश निरस्त करते हुए मामला दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया और 90 दिनों के भीतर विधिसम्मत निर्णय देने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि आरटीआई के अधिकार का दायरा असीमित नहीं है। यदि मांगी गई जानकारी किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी से जुड़ी है और उससे कोई व्यापक जनहित नहीं जुड़ा है, तो उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। साथ ही, सूचना आयोग को भी प्रत्येक मामले में कानून के अनुरूप स्पष्ट निर्णय देने की जिम्मेदारी निभानी होगी।