बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि DNA जांच से किसी व्यक्ति का बच्चे का जैविक पिता होना साबित हो चुका है, तो वह बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने बिलासपुर फैमिली कोर्ट के फैसले में आंशिक संशोधन करते हुए बच्चे के पक्ष में आदेश जारी किया है।
मामले में महिला ने अपने 3 वर्षीय बच्चे के भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। महिला का दावा था कि युवक ने उसके साथ जबरन संबंध बनाए और बाद में शादी का दावा किया। 16 जून 2022 को बच्चे का जन्म हुआ। महिला के अनुसार, युवक ने बच्चे को अपना मानने से इनकार कर दिया। बाद में उसे पता चला कि युवक पहले से शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं।
युवक ने महिला के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वह पहले से शादीशुदा है और महिला को इसकी जानकारी थी। उसने आरोप लगाया कि शादी से इनकार करने के बाद महिला ने उसके खिलाफ झूठे मामले दर्ज कराए।
29 दिसंबर 2025 को फैमिली कोर्ट ने महिला और बच्चे की भरण-पोषण की मांग खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान सामने आया कि पुलिस जांच के दौरान कराई गई DNA रिपोर्ट में युवक को बच्चे का जैविक पिता पाया गया है।
हाई कोर्ट ने कहा कि महिला के भरण-पोषण के दावे को खारिज करने के फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। हालांकि, बच्चे का अधिकार अलग है। कोर्ट ने जैविक पिता को बच्चे के पालन-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए 1 सितंबर 2026 से हर महीने ₹5,000 भरण-पोषण देने का आदेश दिया है।