खनन की कीमत चुका रहे जंगल: 4 साल में 1.95 लाख पेड़ कटे, 2.33 लाख की मिली मंजूरी
Sandhya 03/09/2026

रायपुर। छत्तीसगढ़ में लोहा और कोयला खनन के लिए जंगलों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। राज्य सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक, पिछले चार वर्षों में प्रदेश के 9 जिलों में लोहा, कोयला और उनसे जुड़ी परियोजनाओं के लिए 2 लाख 33 हजार 237 पेड़ों की कटाई की मंजूरी दी गई। इनमें से 1 लाख 95 हजार 292 पेड़ अब तक काटे जा चुके हैं।
खनन परियोजनाओं में निजी कंपनियों के साथ-साथ सरकारी उपक्रम भी शामिल हैं। एनएमडीसी, एसईसीएल और महाराष्ट्र पावर जैसी कंपनियों की परियोजनाओं के लिए भी बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई है। कई इलाकों में खनन परियोजनाओं का स्थानीय लोगों और पर्यावरण संगठनों की ओर से लंबे समय से विरोध भी किया जाता रहा है।
छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है। यहां कोयला और लौह अयस्क का बड़े पैमाने पर खनन होता है। लेकिन इसके लिए जंगलों को हटाने की पर्यावरणीय कीमत भी चुकानी पड़ रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चार वर्षों में 41 खदानों और उनसे जुड़ी परियोजनाओं के लिए पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई। इनमें कई ऐसी परियोजनाएं हैं, जिनके लिए आने वाले समय में भी पेड़ों की कटाई होनी बाकी है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से संबंधित परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है।
इसका मतलब है कि खनन परियोजनाओं के विस्तार के साथ आने वाले समय में जंगलों पर दबाव और बढ़ सकता है।
इन जिलों में इतने पेड़ काटे गए
- कुल मंजूरी: 2 लाख 33 हजार 237 पेड़
- अब तक कटे: 1 लाख 95 हजार 292 पेड़
- कोरबा: 17 खदानों के लिए 19,150 पेड़ काटे गए। यहां एनटीपीसी और एसईसीएल की परियोजनाएं शामिल हैं।
- रायगढ़: 7 खदानों के लिए 69,525 पेड़ों की कटाई की अनुमति है। इनमें से 51,851 पेड़ काटे जा चुके हैं। यहां जिंदल और महाराष्ट्र पावर कंपनी की कोयला खदानें हैं।
- दंतेवाड़ा: एनएमडीसी की 4 खदानों के लिए 21,699 पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है, जिनमें से 15,481 पेड़ काटे जा चुके हैं।
- बीजापुर: एक खदान के लिए 341 पेड़ काटे गए।
- कांकेर: लौह अयस्क की 3 खदानों के लिए 21,297 पेड़ों की कटाई होनी है। इनमें से 9,952 पेड़ काटे जा चुके हैं।
- नारायणपुर: लौह अयस्क की 3 खदानों के लिए 20,491 पेड़ों की कटाई की अनुमति है, जिनमें से 17,836 पेड़ काटे जा चुके हैं।
- रायपुर: टेक्सटाइल उद्योग से जुड़ी परियोजना के लिए 128 पेड़ काटे गए।
- सरगुजा: कोयले की 7 खदानों के लिए 73,941 पेड़ों की कटाई की अनुमति है। इनमें से 73,888 पेड़ काटे जा चुके हैं। यहां परसा ईस्ट-केते बासन और परसा कोल परियोजनाएं शामिल हैं।
- सूरजपुर: कोयले की 3 परियोजनाओं के लिए 6,665 पेड़ काटे जा चुके हैं।
जंगलों की कटाई का असर केवल पेड़ों की संख्या घटने तक सीमित नहीं रहता। खनन के लिए वन क्षेत्र साफ होने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास, जैव विविधता और स्थानीय पर्यावरण प्रभावित होता है। जंगलों पर निर्भर ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की आजीविका पर भी इसका असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि कई खनन परियोजनाओं के खिलाफ स्थानीय स्तर पर लंबे समय से विरोध देखने को मिलता रहा है।
पेड़ों की कटाई के बदले पौधरोपण को लेकर सरकार का कहना है कि क्षतिपूरक वनीकरण की प्रक्रिया सीधे तौर पर हर काटे गए पेड़ के बदले एक पौधा लगाने पर आधारित नहीं है। सरकार के अनुसार, क्षतिपूरक वनीकरण मुख्य रूप से परियोजनाओं के लिए किए गए वन भूमि डायवर्सन के आधार पर किया जाता है।
यानी किसी परियोजना के लिए जितनी वन भूमि दूसरे उपयोग में ली जाती है, उसके बदले निर्धारित नियमों के अनुसार क्षतिपूरक वनीकरण कराया जाता है।
छत्तीसगढ़ में खनिज आधारित उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था और विकास के लिए अहम हैं। कोयला और लौह अयस्क से जुड़े प्रोजेक्ट रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन दूसरी ओर, इनके लिए जंगलों की कटाई पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी करती है।
चार साल में 1.95 लाख से ज्यादा पेड़ों की कटाई और 2.33 लाख से अधिक पेड़ों के लिए मंजूरी का आंकड़ा एक बार फिर यही सवाल उठाता है कि खनिज संसाधनों से विकास की रफ्तार बढ़ाने के साथ जंगलों और पर्यावरण की कीमत कितनी चुकानी पड़ रही है।