हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति को बुजुर्ग मां से अलग करना मानसिक क्रूरता, पति को मिली तलाक की मंजूरी, लोअर कोर्ट का फैसला रद्द

1154216-hc-high-court

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में कहा है कि पति को उसकी बीमार और बुजुर्ग मां से अलग रहने के लिए दबाव बनाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। कोर्ट ने पति के खिलाफ झूठे आपराधिक मामले दर्ज कराने को भी मानसिक प्रताड़ना माना। हाईकोर्ट ने पेंड्रारोड की निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली।

जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि विवाह के बाद पति-पत्नी का नया परिवार जरूर बनता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति अपने बुजुर्ग या बीमार माता-पिता के प्रति नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी बिना किसी उचित कारण के पति पर उसकी बीमार मां से अलग होने का दबाव बनाती है, तो ऐसी स्थिति मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकती है।

मामले के अनुसार, उत्तर प्रदेश के इटावा निवासी विवेक अग्रवाल का विवाह 12 दिसंबर 2014 को पेंड्रारोड निवासी महिला से हुआ था। दोनों का एक बेटा भी है। पति का आरोप था कि पत्नी छोटी-छोटी बातों को लेकर अक्सर विवाद करती थी और उसकी बुजुर्ग व बीमार मां से अलग रहने के लिए उस पर दबाव बनाती थी।

पति ने अपनी बीमार मां को अकेला छोड़कर अलग रहने से इनकार किया, जिसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया। आरोप है कि 11 अगस्त 2019 को पत्नी बिना सहमति के गहने और नकदी लेकर पेंड्रारोड स्थित अपने मायके चली गई। उस समय बच्चा इटावा में ही था।

पत्नी के वापस ससुराल नहीं लौटने पर पति ने पेंड्रारोड की अदालत में मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की।

पेंड्रारोड की निचली अदालत ने 18 फरवरी 2025 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट का कहना था कि पति पत्नी की ओर से की गई कथित क्रूरता को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सका। इसके बाद पति ने निचली अदालत के फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि पति-पत्नी वर्ष 2019 से अलग रह रहे हैं। इस दौरान दोनों के बीच लगातार विवाद और आपराधिक मामलों के चलते वैवाहिक संबंधों में आपसी विश्वास पूरी तरह खत्म हो गया।

हाईकोर्ट ने माना कि पति को उसकी बीमार और बुजुर्ग मां से अलग होने के लिए मजबूर करना, जबकि उसके पास अलग रहने का कोई उचित कारण न हो, मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। कोर्ट ने पति के खिलाफ झूठे आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने के आरोप को भी मानसिक पीड़ा और क्रूरता के पहलू के रूप में देखा।

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पेंड्रारोड की निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया और पति की तलाक याचिका मंजूर कर ली।