160 करोड़ के आर्बिट्रल अवार्ड की वसूली में अफसरों को राहत, हाई कोर्ट ने निजी देनदारी से किया इनकार
Sandhya 18/09/2026

बिलासपुर : बस्तर में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण से जुड़े करीब 160.30 करोड़ रुपये के आर्बिट्रल अवार्ड की वसूली के मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आर्बिट्रल अवार्ड विभाग के खिलाफ है, तो केवल भुगतान में देरी के आधार पर संबंधित अधिकारियों पर व्यक्तिगत आर्थिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। हाई कोर्ट ने वाणिज्यिक कोर्ट के उन निर्देशों को निरस्त कर दिया, जिनमें अधिकारियों से व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी तय करने और अवमानना कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
राज्य शासन, लोक निर्माण विभाग के सचिव और अधीक्षण अभियंता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने कहा कि अवार्ड विभाग के विरुद्ध है, किसी व्यक्तिगत अधिकारी के खिलाफ नहीं। ऐसे में विभाग की ओर से भुगतान प्रक्रिया संभालने वाले अधिकारियों को अवार्ड की रकम या उस पर बढ़ने वाले ब्याज का व्यक्तिगत देनदार नहीं बनाया जा सकता।
हालांकि, हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आर्बिट्रल अवार्ड अंतिम हो चुका है और उसकी वसूली की कार्रवाई जारी रह सकती है। कोर्ट के मुताबिक मध्यस्थता अधिनियम की धारा 36 के तहत अवार्ड की वसूली सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत डिक्री की तरह की जानी है। इसलिए निष्पादन अदालत को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही रकम की वसूली करनी होगी।
मामला बस्तर जिले में एनएच-63 के विभिन्न हिस्सों में दो लेन सड़क निर्माण से जुड़ा है। यह परियोजना केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म योजना के तहत शुरू की गई थी। परियोजना की शुरुआती स्वीकृत लागत करीब 169.23 करोड़ रुपये थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 211.53 करोड़ रुपये किया गया। छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग इस परियोजना की कार्यान्वयन एजेंसी था।
कीस्टोन (जेवी) को अक्टूबर 2012 में स्वीकृति पत्र और दिसंबर 2012 में कार्यादेश जारी किया गया था। कंपनी ने जून 2019 में काम पूरा किया। इसके बाद ठेकेदार ने करीब 190.33 करोड़ रुपये के अतिरिक्त दावे किए, जिन्हें विभाग ने स्वीकार नहीं किया।
विवाद बढ़ने के बाद ठेकेदार ने अनुबंध में मौजूद मध्यस्थता प्रावधान का सहारा लिया। अगस्त 2020 में रंगराजू को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया गया। राज्य की ओर से प्रभावी बचाव प्रस्तुत नहीं हो पाने के बाद मध्यस्थता की कार्यवाही एकतरफा आगे बढ़ी और 2 सितंबर 2022 को 160,30,11,411 रुपये का अवार्ड पारित किया गया। हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में इस अवार्ड पर ब्याज की शर्तों का भी उल्लेख है।
राज्य सरकार ने मध्यस्थता अधिनियम की धारा 34 के तहत अवार्ड को चुनौती दी थी, लेकिन यह याचिका खारिज हो गई। इसके बाद धारा 37 के तहत की गई अपील भी सफल नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका भी देरी के आधार पर खारिज हो चुकी है। इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अवार्ड के निष्पादन का रास्ता साफ हो गया।
अवार्ड की रकम का भुगतान नहीं होने के कारण ब्याज लगातार बढ़ता गया। अवार्ड धारक के मुताबिक जून 2026 तक कुल देय राशि 222 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी थी। भुगतान में देरी को लेकर वाणिज्यिक कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और विभाग की वित्तीय स्थिति तथा भुगतान की प्रक्रिया से संबंधित जानकारी देने के निर्देश दिए थे।
वाणिज्यिक कोर्ट ने जून 2026 में भुगतान में देरी पर नाराजगी जताते हुए अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी तय करने और अवमानना कार्रवाई की संभावना व्यक्त की थी। इसके खिलाफ राज्य के अधिकारियों ने हाई कोर्ट का रुख किया।
हाई कोर्ट ने कहा कि मनी अवार्ड की वसूली के लिए निष्पादन की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। निष्पादन अदालत केवल इसलिए अवमानना की कार्रवाई को वसूली के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकती कि विभाग ने अवार्ड की रकम का भुगतान नहीं किया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारियों से विभाग की संपत्ति, बैंक खातों और भुगतान के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी ली जा सकती है, लेकिन इससे उनकी व्यक्तिगत देनदारी नहीं बनती।
हाई कोर्ट ने वाणिज्यिक कोर्ट के आदेश में सुप्रीम कोर्ट में लंबित समीक्षा याचिकाओं को लेकर की गई “हॉपिंग अगेंस्ट होप” टिप्पणी को भी उचित नहीं माना। हाई कोर्ट के अनुसार लंबित न्यायिक कार्यवाही के संभावित परिणाम पर निचली अदालत को टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। समीक्षा याचिका लंबित रहने मात्र से अवार्ड पर स्वतः रोक नहीं लगती, इसलिए अवार्ड धारक कानून के अनुसार निष्पादन की कार्रवाई आगे बढ़ा सकता है।
हाई कोर्ट के फैसले का सार यह है कि आर्बिट्रल अवार्ड की रकम की वसूली पर रोक नहीं लगाई गई है, लेकिन इसका आर्थिक बोझ व्यक्तिगत अधिकारियों पर नहीं डाला जा सकता। यानी विभाग को कानून के अनुसार अवार्ड का भुगतान करना होगा, जबकि संबंधित अधिकारियों पर केवल भुगतान प्रक्रिया में उनकी भूमिका के आधार पर निजी वित्तीय देनदारी या अवमानना कार्रवाई नहीं थोपी जा सकती।