छत्तीसगढ़ शिक्षक भर्ती आरक्षण रोस्टर पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, नियुक्त शिक्षकों को तत्काल हटाने से इनकार

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षक भर्ती के आरक्षण रोस्टर को लेकर चल रहे विवाद पर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने भर्ती प्रक्रिया में अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए निर्धारित आरक्षण और निरस्त की जा चुकी आरक्षण नीति के आधार पर रोस्टर लागू किए जाने से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई की।
मामला स्कूल शिक्षा विभाग और व्यापमं की ओर से 4 मई 2023 को सहायक शिक्षक, शिक्षक और व्याख्याता के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती के लिए जारी विज्ञापन से जुड़ा है। कामेश्वर कुमार यादव, योगेंद्र कुमार शर्मा, परिमल कुमार भोई सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने भर्ती में लागू आरक्षण रोस्टर को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि राज्य सरकार ने 58 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित उस व्यवस्था के आधार पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई, जिसे हाई कोर्ट पहले ही असंवैधानिक ठहराकर निरस्त कर चुका था। उनका कहना था कि निरस्त हो चुकी अधिसूचना के आधार पर तैयार रोस्टर को नई भर्ती में लागू करना उचित नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नौशीना आफरीन अली सहित अन्य अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि शिक्षक के ई-कैडर के कुल 1,113 पदों में से 698 पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित किए गए थे। यह कुल पदों का लगभग 62.71 प्रतिशत था।
इसी तरह टी-कैडर के 4,659 पदों में से 3,105 पद एसटी वर्ग के लिए आरक्षित होने का दावा किया गया, जो करीब 66.64 प्रतिशत है। सहायक शिक्षक के पदों में भी आरक्षण का अनुपात 56.62 प्रतिशत से 68.42 प्रतिशत तक बताया गया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि आरक्षण का यह अनुपात संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। उन्होंने विवादित रोस्टर को निरस्त कर वैध आरक्षण नियमों के अनुसार दस्तावेज सत्यापन, काउंसलिंग और नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी कराने की मांग की।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि 29 नवंबर 2012 को जारी अधिसूचना के जरिए राज्य में कुल आरक्षण का अनुपात बढ़ाकर 58 प्रतिशत किया गया था। हाई कोर्ट ने 19 सितंबर 2022 को इस व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था।
इसके बावजूद उसी नीति और उससे जुड़े रोस्टर के आधार पर नई भर्ती का विज्ञापन जारी किए जाने पर सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जब मूल अधिसूचना ही निरस्त हो चुकी थी, तो उसके आधार पर तैयार रोस्टर लागू नहीं किया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि बैकलॉग पदों को शामिल करने के नाम पर अन्य वर्गों के लिए निर्धारित अवसर प्रभावित नहीं होने चाहिए।
राज्य शासन की ओर से उप महाधिवक्ता आनंद दादरिया ने पक्ष रखते हुए बताया कि भर्ती विज्ञापन में नए पदों के साथ वर्ष 2019 की भर्ती के लगभग 3,190 बैकलॉग पद भी शामिल किए गए थे। शासन के अनुसार, सहायक शिक्षक और शिक्षक के पदों की प्रकृति अलग-अलग होने के कारण जिला एवं संभाग स्तर पर रोस्टर लागू किया गया। इसमें बस्तर और सरगुजा संभाग की स्थानीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा गया था।
शासन ने यह भी दलील दी कि वर्ष 2022 के हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस मामले में लंबित विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) पर 1 मई 2023 को अंतरिम आदेश पारित हुआ था, जिसके आधार पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति मिलने का तर्क दिया गया।
इस मामले में हाई कोर्ट ने पहले से नियुक्त शिक्षकों को तत्काल सेवा से हटाने का निर्देश नहीं दिया। साथ ही वर्तमान और भविष्य की नियुक्तियों तथा पदोन्नतियों को सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन रखने की बात कही गई।
फैसले का अहम पहलू यह है कि अदालत ने पहले से कार्यरत शिक्षकों की सेवा में तत्काल बदलाव करने के बजाय भर्ती प्रक्रिया की निरंतरता और आरक्षण व्यवस्था की संवैधानिक वैधता से जुड़े सवालों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के अंतिम निर्णय का इस विवाद पर आगे प्रभाव पड़ सकता है।
