छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- जजों को IPC की धारा 304 के प्रावधान तक नहीं पता! हत्या के मामले में सरकार और आरोपी को नोटिस

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नई दिल्ली/बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक फैसले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। हत्या के एक मामले में हाई कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि और सजा में किए गए बदलाव पर सवाल उठाते हुए शीर्ष अदालत ने उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। जस्टिस जेबी पारदीवाला की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट की कार्यप्रणाली की हालत दयनीय है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब जजों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के भाग-I और भाग-II के बीच अंतर की समझ नहीं है, तो उनसे सबूतों के सही मूल्यांकन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता और छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने पूछा है कि हाई कोर्ट के फैसले को निरस्त कर निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को दोबारा बहाल क्यों न किया जाए।

यह मामला महासमुंद जिले के सरायपाली निवासी चिंतामणि उर्फ चिंटू पटेल से जुड़ा है। सरायपाली की प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 29 सितंबर 2022 को आरोपी को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 29 नवंबर 2024 को अपील पर सुनवाई करते हुए हत्या की दोषसिद्धि को IPC की धारा 302 से बदलकर धारा 304 भाग-II के तहत कर दिया था। इसके साथ ही आजीवन कारावास की सजा घटाकर 10 वर्ष कर दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का पर्याप्त आकलन किए बिना ही अपराध की श्रेणी और सजा में बदलाव कर दिया। शीर्ष अदालत के मुताबिक, मृतका के शरीर पर आई चोटों की प्रकृति, अपराध में इस्तेमाल किए गए हथियार और घटना की शुरुआत से जुड़ी परिस्थितियों पर उचित ध्यान दिया जाना जरूरी था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि क्या हाई कोर्ट रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक गवाहियों को सही तरीके से समझने और उनका मूल्यांकन करने में सफल रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी और छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि हाई कोर्ट का 29 नवंबर 2024 का आदेश क्यों न रद्द कर दिया जाए और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बहाल क्यों न की जाए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाई कोर्ट का फैसला निरस्त नहीं किया है। मामले में अंतिम निर्णय पक्षकारों के जवाब, दलीलों और आगे की सुनवाई के बाद लिया जाएगा।

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