छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अनुकंपा नियुक्ति के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र अनिवार्य नहीं, अधिकारियों को नए सिरे से दावा जांचने के निर्देश

1154216-hc-high-court

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि नियुक्ति के दावे पर विचार करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने इस शर्त के आधार पर जारी किए गए दो विभागीय पत्रों को निरस्त कर दिया है। साथ ही अधिकारियों को पंजीकृत दत्तक विलेख और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच कर नियमानुसार नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

कोरबा निवासी पवन मेश्राम ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि उनकी बुआ दुर्गा मेश्राम जांजगीर में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के कार्यालय में सहायक ग्रेड-दो के पद पर कार्यरत थीं। वह तलाकशुदा थीं और उनकी कोई संतान नहीं थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, दुर्गा मेश्राम ने अपने जीवनकाल में उन्हें गोद लिया था। इस संबंध में 8 फरवरी 2019 को पंजीकृत दत्तक विलेख तैयार कराया गया था।

इससे पहले 24 नवंबर 2018 को सेवा अभिलेख में नाम दर्ज कराने और नामांकित व्यक्तियों में संशोधन के लिए भी आवेदन दिया गया था। दुर्गा मेश्राम का 24 मार्च 2019 को सेवाकाल के दौरान निधन हो गया। इसके बाद पवन मेश्राम ने 9 मई 2019 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।

लंबे समय तक आवेदन पर निर्णय नहीं होने के कारण उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 24 जनवरी 2023 को अदालत ने अधिकारियों को आवेदन पर जल्द निर्णय लेने का निर्देश दिया। इसके बाद विभागीय अधिकारियों ने 24 फरवरी और 21 जुलाई 2023 को पत्र जारी कर याचिकाकर्ता से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने को कहा।

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र को अनिवार्य शर्त नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने पूर्व में दिए गए न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पंजीकृत दत्तक विलेख और अन्य संबंधित दस्तावेजों के आधार पर दत्तक ग्रहण तथा नियुक्ति के दावे की जांच की जा सकती है।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता को यह प्रमाणित करना होगा कि वह मृतक कर्मचारी के दत्तक पुत्र हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मुख्य रूप से मृतक के बकाया ऋण और संबंधित देनदारियों जैसे मामलों से जुड़ा होता है। इसलिए इसे अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करने की पूर्व अनिवार्य शर्त नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम की धारा 16 का उल्लेख करते हुए कहा कि निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी होने पर पंजीकृत दत्तक विलेख को दत्तक ग्रहण के पक्ष में खंडनीय कानूनी अनुमान का आधार माना जा सकता है।

हाई कोर्ट ने 24 फरवरी और 21 जुलाई 2023 को जारी दोनों विभागीय पत्रों को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों को 14 जून 2013 की लागू अनुकंपा नियुक्ति नीति और अन्य कानूनी प्रावधानों के अनुसार पवन मेश्राम के दावे पर नए सिरे से विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

इस फैसले से स्पष्ट है कि अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करते समय केवल उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की मांग के आधार पर प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। हालांकि, नियुक्ति का अंतिम निर्णय संबंधित नीति और दस्तावेजों की जांच के अनुसार लिया जाएगा।