निजी मेडिकल कॉलेजों को हाई कोर्ट से राहत, हॉस्टल-मेस और परिवहन शुल्क में कटौती के आदेश रद्द

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बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निजी मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल, मेस और परिवहन शुल्क में कटौती करने तथा विद्यार्थियों से वसूली गई अतिरिक्त राशि वापस करने के आदेशों को निरस्त कर दिया है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने मामले में राज्य सरकार को नए सिरे से शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने प्रकरण को पुनर्विचार के लिए प्रवेश एवं फीस विनियामक समिति के पास वापस भेज दिया है।

हाई कोर्ट ने रायपुर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और श्रीबालाजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि शुल्क निर्धारित करते समय कॉलेजों के वास्तविक खर्च, विद्यार्थियों की कुल संख्या और हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की संख्या को ध्यान में रखना जरूरी है। इसके साथ ही संबंधित संस्थानों को अपना पक्ष रखने के लिए प्रभावी सुनवाई का अवसर भी दिया जाना चाहिए।

दरअसल, रायपुर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और श्रीबालाजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ने प्रवेश एवं फीस विनियामक समिति की 3 अप्रैल 2025 की अनुशंसा को चुनौती दी थी। इसके अलावा राज्य शासन के 18 सितंबर 2025 और आयुक्त चिकित्सा शिक्षा के 23 सितंबर 2025 को जारी आदेशों के खिलाफ भी हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

इन आदेशों के माध्यम से दोनों मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल, मेस और परिवहन शुल्क में कटौती की गई थी। साथ ही विद्यार्थियों से निर्धारित शुल्क से अधिक वसूली गई राशि वापस करने के निर्देश भी दिए गए थे।

श्रीबालाजी मेडिकल कॉलेज ने प्रति विद्यार्थी सालाना हॉस्टल और मेस शुल्क के लिए 3 लाख रुपये तथा परिवहन के लिए 2.50 लाख रुपये प्रस्तावित किए थे। हालांकि, फीस विनियामक समिति ने हॉस्टल और मेस शुल्क घटाकर 78,059 रुपये तथा परिवहन शुल्क 13,719 रुपये निर्धारित कर दिया था।

कॉलेज प्रबंधन की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि समिति ने शुल्क निर्धारण के दौरान भवन निर्माण, कर्मचारियों के वेतन, बिजली, रखरखाव, ईंधन और परिवहन सहित अन्य सुविधाओं पर होने वाले वास्तविक खर्च का सही आकलन नहीं किया। इसके अलावा अलग-अलग शैक्षणिक सत्रों में विद्यार्थियों की संख्या और हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की संख्या में भी अंतर था।

संस्थानों ने यह भी आरोप लगाया कि वित्तीय दस्तावेज प्रस्तुत करने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। समिति की अनुशंसा में सभी सदस्यों के हस्ताक्षर नहीं होने का मुद्दा भी उठाया गया।

राज्य शासन और फीस विनियामक समिति की ओर से बताया गया कि विद्यार्थियों से निर्धारित सीमा से अधिक शुल्क वसूले जाने और मुनाफाखोरी की शिकायतें मिलने के बाद कार्रवाई की गई थी। कॉलेजों को कई बार नोटिस जारी कर खर्च से संबंधित दस्तावेज मांगे गए थे और सुनवाई के अवसर भी उपलब्ध कराए गए थे।

शासन के अनुसार, समिति ने उपलब्ध वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर प्रति विद्यार्थी सालाना 96,407 रुपये का उचित खर्च निर्धारित किया था, जबकि संस्थानों द्वारा कथित तौर पर 5.50 लाख रुपये तक शुल्क वसूला जा रहा था।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि फीस विनियामक समिति को मुनाफाखोरी और निर्धारित सीमा से अधिक शुल्क वसूली पर रोक लगाने का अधिकार है। हालांकि, शुल्क तय करते समय कॉलेजों की ओर से प्रस्तुत प्रासंगिक वित्तीय दस्तावेजों और वास्तविक खर्चों पर निष्पक्ष तरीके से विचार करना भी जरूरी है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सुनवाई का अवसर देना पर्याप्त नहीं है। संस्थानों की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों और तथ्यों का वास्तविक मूल्यांकन भी होना चाहिए। यदि किसी खर्च को स्वीकार नहीं किया जाता है, तो उसे खारिज करने के पीछे उचित कारण भी दर्ज किए जाने चाहिए।

हाई कोर्ट ने पाया कि समिति की अनुशंसा में वास्तविक खर्च, हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों की संख्या और अलग-अलग मदों में होने वाले व्यय का पर्याप्त विश्लेषण स्पष्ट नहीं है। ऐसे में अतिरिक्त शुल्क वसूली और उसकी वापसी से जुड़े आदेश मौजूदा स्वरूप में बरकरार नहीं रखे जा सकते।

हाई कोर्ट ने फीस विनियामक समिति की 3 अप्रैल 2025 की अनुशंसा और उसके आधार पर जारी राज्य शासन तथा चिकित्सा शिक्षा आयुक्त के आदेशों को निरस्त कर दिया है।

कोर्ट ने मामले को सक्षम प्राधिकारी और समिति के पास वापस भेजते हुए नए सिरे से शुल्क निर्धारण करने का निर्देश दिया है। नई प्रक्रिया में विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या, हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की संख्या, कर्मचारियों का वेतन, बिजली, रखरखाव, भवन, ईंधन और परिवहन सहित सभी संबंधित खर्चों का विस्तृत आकलन करना होगा।

इसके बाद सभी तथ्यों और वित्तीय दस्तावेजों पर विचार करते हुए कारण सहित नया आदेश जारी करना होगा।

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