धान का कटोरा छत्तीसगढ़ में चावल के दामों में लगी आग, 40 रुपए किलो तक बढ़े भाव

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। प्रदेश में बड़े पैमाने पर धान की खेती होने के बावजूद बारीक और खुशबूदार चावल के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता बनी हुई है। व्यापारियों के मुताबिक, बाहरी राज्यों से चावल की आवक प्रभावित होने के कारण स्थानीय बाजारों में कीमतें बढ़ी हैं।
भिलाई और दुर्ग के बाजारों में चावल की अलग-अलग किस्मों के भाव में तेजी आई है।
| चावल की किस्म | पुरानी कीमत | नई कीमत |
|---|---|---|
| अब्बा हुजूर | ₹70 | ₹110 |
| जय श्रीराम | ₹62 | ₹100 |
| काली मूंछ | ₹65 | ₹85 |
| जीरा राइस | ₹90 | ₹120 |
प्रदेश में मुख्य रूप से मोटे और मध्यम किस्म के धान का उत्पादन होता है। वहीं, बारीक और सुगंधित चावल की मांग पूरी करने के लिए कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों से चावल मंगाया जाता है।
व्यापारियों का कहना है कि इन राज्यों से आने वाली सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके अलावा बेमौसम बारिश और बाढ़ के कारण कुछ क्षेत्रों में धान की फसल प्रभावित होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, फसल नुकसान और सप्लाई में कमी के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
चावल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई परिवार हर महीने 25 किलो चावल खरीदता है और उसकी पसंदीदा किस्म 30 रुपए किलो महंगी हो जाती है, तो उसे हर महीने 750 रुपए अतिरिक्त खर्च करने होंगे। सालभर में यह राशि 9 हजार रुपए तक पहुंच सकती है।
भिलाई के राशन दुकान संचालक विजय राठी के मुताबिक, प्रदेश में बारीक और सुगंधित धान का स्थानीय उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है। किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराकर ऐसी किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
इससे दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम करने और परिवहन लागत घटाने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल चावल की कीमतों में राहत मिलने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। व्यापारियों की नजर दूसरे राज्यों से आने वाली खेप पर है। यदि चावल की आवक सामान्य होती है तो कीमतों में नरमी आ सकती है। वहीं, सप्लाई में कमी बनी रहने पर उपभोक्ताओं को महंगे दामों पर ही चावल खरीदना पड़ सकता है।
