शादी का झांसा देकर दुष्कर्म, 21 वर्षीय युवती को हाई कोर्ट ने दी गर्भपात की अनुमति

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने के मामले में गर्भवती हुई 21 वर्षीय युवती को गर्भपात कराने की अनुमति दे दी है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य शासन और बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को निर्देश दिया है कि युवती को एक सप्ताह के भीतर सरकारी अस्पताल में भर्ती कराकर गर्भपात की चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी कराई जाए।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दुष्कर्म के आरोप से जुड़े अनचाहे गर्भ को जारी रखने के लिए पीड़िता को मजबूर करना उसके शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा, निजता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करेगा।
मामले के अनुसार, 21 वर्षीय युवती ने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में आरोपी ने उसे बिना बताए किसी दूसरी महिला से शादी कर ली। इसकी जानकारी मिलने पर युवती ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर मस्तूरी थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत अपराध दर्ज किया गया।
इस बीच चिकित्सकीय जांच में युवती के गर्भवती होने की पुष्टि हुई। 5 अक्टूबर 2026 को कराई गई सोनोग्राफी में गर्भ की अवधि आठ सप्ताह बताई गई थी। इसके बाद युवती ने गर्भपात की अनुमति के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 30 अक्टूबर को मेडिकल बोर्ड को युवती की चिकित्सकीय जांच करने का निर्देश दिया था। 2 नवंबर को पेश की गई रिपोर्ट में गर्भ की अवधि 12 सप्ताह बताई गई।
मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में युवती की शारीरिक स्थिति सामान्य बताई और चिकित्सकीय दृष्टि से गर्भपात की प्रक्रिया को उपयुक्त माना। बोर्ड के अनुसार, यह प्रक्रिया जिला अस्पताल या उससे उच्च स्तर के चिकित्सा संस्थान में कराई जा सकती है।
याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम, 1971 की धारा 3 का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म के कारण ठहरे गर्भ से होने वाली मानसिक पीड़ा को कानून गंभीर मानसिक क्षति के रूप में मान्यता देता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि महिला को अपने शरीर, गर्भावस्था और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार है। उसकी शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा का सम्मान किया जाना आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि युवती को एक सप्ताह के भीतर जिला अस्पताल, संबद्ध सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल या आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं वाले अन्य सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए।
गर्भपात की प्रक्रिया कम से कम दो स्त्री रोग विशेषज्ञों और एक सर्जन सहित योग्य चिकित्सकों की टीम की निगरानी में पूरी की जाएगी। इसके लिए युवती की लिखित सहमति लेना अनिवार्य होगा। मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसके पिता या अभिभावक की सहमति लेने का भी निर्देश दिया है।
हाई कोर्ट ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को युवती के लिए एंबुलेंस, अस्पताल में भर्ती, चिकित्सकीय समन्वय और उपचार की समुचित व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं। गर्भपात से पहले और बाद में आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी।
कोर्ट ने जांच और अभियोजन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भ्रूण के ऊतकों और DNA नमूनों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। साथ ही युवती की पहचान और निजता पूरी तरह गोपनीय रखने की हिदायत दी है।
राज्य शासन को पूरी प्रक्रिया संपन्न होने के दो सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी।
