आठवें वेतन आयोग की रूपरेखा को कैबिनेट की मंजूरी, 18 महीने का समय… 50 लाख कर्मियों को लाभ
रायपुर (पीआईबी)। केन्द्रीय कैबिनेट ने 8वें वेतन आयोग के तहत विचार होने वाले विषयों को मंजूरी दे दी है। मंगलवार को हुई केबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया। 8वां केंद्रीय वेतन आयोग एक अस्थायी निकाय होगा। आयोग में एक अध्यक्ष, एक सदस्य (अंशकालिक) और एक सदस्य-सचिव शामिल होंगे। यह अपने गठन की तिथि से 18 महीनों के भीतर अपनी सिफ़ारिशें प्रस्तुत करेगा। यदि आवश्यक हो, तो सिफ़ारिशों को अंतिम रूप दिए जाने पर आयोग किसी भी मामले पर अंतरिम रिपोर्ट भेजने पर विचार कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई को अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
केंद्रीय वेतन आयोगों का गठन समय-समय पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों की पारिश्रमिक संरचना, सेवानिवृत्ति लाभों और अन्य सेवा शर्तों के विभिन्न मुद्दों पर विचार करने और उनमें आवश्यक परिवर्तनों पर सिफारिशें करने के लिए किया जाता है। आमतौर पर, वेतन आयोगों की सिफारिशें हर दस साल के अंतराल के बाद लागू की जाती हैं। इस प्रवृत्ति के अनुसार, 8वें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों का प्रभाव सामान्यतः 01.01.2026 से अपेक्षित होगा। सरकार ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन और अन्य लाभों में परिवर्तनों की जाँच और सिफारिश करने के लिए जनवरी, 2025 में 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन की घोषणा की थी।
सूचना व प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि आठवां वेतन आयोग 18 महीने के भीतर सिफारिशें प्रस्तुत करेगा, जो 1 जनवरी 2026 से लागू होने की संभावना है। मंत्री ने बताया कि आयोग की सिफारिशें रक्षा सेवा कर्मियों और लगभग 69 लाख पेंशनभोगियों सहित लगभग 50 लाख केंद्र सरकार के कर्मचारियों को कवर करेंगी।
पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना को मिली मंजूरी
केंद्रीय कैबिनेट ने पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना को भी मंजूरी दे दी है। सरकार ने प्रति किलोग्राम के आधार पर नाइट्रोजन (एन), फास्फोरस (पी), पोटाश (के) और सल्फर (5) के लिए सब्सिडी अधिसूचित की है। एनबीएस सब्सिडी व्यवस्था के अंतर्गत 28 ग्रेड के पी और के उर्वरक शामिल हैं। सब्सिडी दर निर्धारण में अपनाए जाने वाले सिद्धांत तय किए गए हैं। ये हैं- यूरिया, डीएपी, एमओपी और सल्फर के अंतर्राष्ट्रीय आयात मूल्य की पहचान, आयात मूल्य के आधार पर, वितरित मूल्य प्रचलित विनिमय दर पर निर्धारण, पोषक तत्वों की आवश्यकता, संतुलित उपयोग, सब्सिडी का बोझ, एमआरपी जैसे अन्य कारकों पर विचार इत्यादि।