दहेज हत्या केस में हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- मौत से पहले दहेज मांग को लेकर उत्पीड़न साबित होना अनिवार्य

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बिलासपुर| बिलासपुर हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से घिरी एक सास को बरी कर दिया है। हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा वर्ष 2010 में सुनाई गई 7 साल के सश्रम कारावास की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बहू को मौत से ठीक पहले दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था।

याचिका की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे के सिंगल बेंच में हुई। बता दें, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी सास को दोषी मानते हुए 7 साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी सास ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

मामला दुर्ग का है। सोनल का विवाह 18 जून 2006 को मनीष के साथ हुआ था। शादी के तकरीनब 6 महीने बाद 21 दिसंबर 2006 को सोनल की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। मृतका के मायके पक्ष (पिता, मां और भाई) ने आरोप लगाया था कि शादी के कुछ दिनों बाद ही सोनल की सास शशिकला बाफना ने दहेज के प्रति नाखुशी जताते हुए उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था।

आरोप था कि, बेटे को कोलकाता में नौकरी मिलने के बावजूद सास ने बहू सोनल को तब तक कोलकाता भेजने से मना कर दिया, जब तक वह मायके से 10 से 15 लाख रुपए नहीं ले आती।

घटना तिथि 21 दिसंबर 2006 की सुबह सास ने सोनल से मारपीट कर उसे घर से बाहर निकाल दिया था। इसके बाद सोनल अपने मायके पहुंची और शाम को उसने मायके की छत से कूदकर आत्महत्या कर ली। मार्च 2010 में एफटीसी दुर्ग ने आरोपी सास को सजा सुनाई थी।

याचिका की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे के सिंगल बेंच में हुई। अपीलकर्ता सास की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कोर्ट काे बताया, घटना के 5 दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। मेडिकल साक्ष्यों के अनुसार, शुरुआत में परिजनों ने ही डॉक्टर को बताया था कि सोनल बाथरूम में गिरने के कारण घायल हुई है।

पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर के बयान से भी यह स्पष्ट नहीं हुआ कि यह हत्या थी, आत्महत्या थी या महज एक दुर्घटना। मृतका के मां-पिता और भाई ने स्वीकार किया कि आरोपी सास ने कभी भी उनके सामने सीधे तौर पर पैसों या दहेज की मांग नहीं की थी। जो भी बातें थीं, वे केवल सोनल के कहे अनुसार सुनी-सुनाई थी।

मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा, किसी मामले को ‘दहेज मृत्यु’ (धारा 304-बी) के तहत लाने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि मौत से ठीक पहले महिला को दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया हो।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कई मुख्य बातों का जिक्र किया है। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि सोनल की मौत छत से कूदने के कारण ही हुई थी, क्योंकि शुरुआती मेडिकल रिकॉर्ड में बाथरूम में गिरने का जिक्र था।

गवाहों के बयानों से केवल यह पता चलता है कि सास-बहू के बीच सामान्य झगड़े होते थे, लेकिन मौत से ठीक पहले दहेज के लिए क्रूरता की बात साबित नहीं होती। हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का बारीकी से मूल्यांकन नहीं किया और गलत निष्कर्ष पर पहुंचकर दोषसिद्धि का आदेश पारित कर दिया, जो कानूनन टिकने योग्य नहीं है। हाई कोर्ट ने आरोपी सास की अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के 17 मार्च 2010 के आदेश को निरस्त कर दिया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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