विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा अलग-अलग, हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर कही बड़ी बात
बिलासपुर। न्यायिक अभिरक्षा में बंद आरोपी को अदालत ले जाते समय लापरवाही बरतने और उसे फरार होने का अवसर देने के आरोप में बर्खास्त किए गए दो आरक्षकों को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। हाई कोर्ट ने नौकरी में बहाल करने की मांग को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया है। फैसले को चुनौती देते हुए आरक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका SLP दायर की है। सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एसएलपी की सुनवाई के लिए 13 जुलाई 2026 की तिथि तय कर दी है।
रायपुर के पूर्व आरक्षक सुरेश यादव और जशपुर निवासी बुधना राम भगत, दोनों वर्ष 2006 में रायपुर में आरक्षक पद पर पदस्थ थे। 30 जनवरी 2006 को उन्हें राहुल उर्फ अशोक शिंदे नामक आरोपी को राजनादगांव न्यायालय में पेश करने की जिम्मेदारी दी गई थी। आरोप है कि दोनों आरक्षकों ने आरोपी को पर्याप्त सुरक्षा के बिना पावर हाउस क्षेत्र में छोड़ दिया, जहां उसने एक व्यापारी से उगाही की। बाद में उसे निजी वाहन से राजनांदगांव ले जाया गया, वहां भी उसे दुकान और रिश्तेदारों के घर जाने की अनुमति दी गई और इसी दौरान वह पुलिस अभिरक्षा से फरार हो गया।
घटना के बाद विभागीय जांच शुरू हुई। जांच अधिकारी ने आरोपों को प्रमाणित पाया। रिपोर्ट के आधार पर दोनों आरक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर 23 दिसंबर 2006 को सेवा से पृथक कर दिया गया। उनकी विभागीय अपील भी 16 मई 2007 को खारिज कर दी गई। बाद में दोनों आरक्षकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 223 के तहत आपराधिक मामला दर्ज हुआ।
मामले की सुनवाई के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 30 जुलाई 2015 को कर दिया। जेएमएफसी कोर्ट के फैसले के आधार पर दोनों आरक्षकों ने सेवा बहाली की मांग करते हुए छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने कहा, जब आपराधिक मामले में उन्हें राहत मिल गई तो विभागीय दंड भी समाप्त माना जाना चाहिए।
राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए लॉ अफसर ने कहा, आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच के आरोप अलग-अलग थे। विभागीय जांच में आरोपी को फरार होने देने, सुरक्षा में गंभीर लापरवाही और कर्तव्यहीनता जैसे आरोप थे, जिन्हें साक्ष्यों से प्रमाणित पाया गया।
मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने आरक्षकों की याचिका को खारिज करते हुए कहा, विभागीय जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा की गई, कर्मचारियों को पूरा अवसर दिया गया तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया गया है। कोर्ट ने कहा, विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे की प्रकृति अलग होने पर केवल बरी होने से विभागीय कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा, न्यायिक समीक्षा के दायरे में अदालत केवल प्रक्रिया की वैधता देखती है, न कि विभागीय जांच में दर्ज तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन करती है।
टाइम लाइन
30 जनवरी 2006 : आरोपी राहुल उर्फ अशोक शिंदे को पेशी के लिए ले जाते समय फरार होने का मौका मिला।
23 दिसंबर 2006 : दोनों आरक्षक सेवा से बर्खास्त।
16 मई 2007 : विभागीय अपील खारिज।
30 जुलाई 2015 : आपराधिक मामले में दोनों बरी।
20 फरवरी 2025 : छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने बहाली की याचिका खारिज की।
16 जून 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने SLP में संशोधन के लिए एक सप्ताह का समय दिया।