हाई कोर्ट ने तय की कानूनी सीमा: अवमानना कार्रवाई में राज्य या संस्था को नहीं बनाया जा सकता पक्षकार
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस बीडी गुरु ने अवमानना याचिका को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस गुरु ने अपने फैसले में कहा है, अदालत की अवमानना की कार्यवाही अपने स्वरूप से ही व्यक्तिगत कार्यवाही होती है। प्राधिकरण, निगम व निकाय पर न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने एनएचएआई के खिलाफ दायर अवमानना याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है,अवमानना याचिका केवल किसी व्यक्ति के विरुद्ध ही विचारणीय है, न कि राज्य या संस्था के विरुद्ध।
बता दें, हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद 16 जून, 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 19 जून, 2026 को जस्टिस बीडी गुरु ने फैसला सुनाया है। यह फैसला न्याय दृष्टांत बन गया है।
अरविंद कुमार गोयल राम लाइफ सिटी, सकरी, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ ने अपने अधिवक्ता बी.पी. शर्मा और अधिवक्ता एम.एल. साकेत के माध्यम से छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में एनएचएआई सहित आधा दर्जन अफसरों के खिलाफ न्यायालयीन आदेश की अवहेलना करने के आरोप में अवमानना याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट ने 08 अक्टूबर 2024 को पारित आदेश के परिपालन के संबंध में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ‘एनएचएआई’ को निर्देशित किया था, आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 90 दिनों की अवधि के भीतर निराकरण किया जाए। तय अवधि में निराकरण ना करने पर अवमानना याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता बी.पी. शर्मा और अधिवक्ता एम.एल. साकेत ने कोर्ट को बताया, अवमानना याचिका इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश की अवहेलना का आरोप लगाते हुए दायर की गई है और एनएचएआई, अवमाननाकर्ता होने के नाते, न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12(5) और उससे संलग्न स्पष्टीकरण के तहत कार्यवाही के लिए उत्तरदायी है। अधिवक्ता के अनुसार 1971 के अधिनियम की धारा 12(5) और उससे संलग्न स्पष्टीकरण में निहित प्रावधानों के मद्देनजर, एनएचएआई एक आवश्यक पक्षकार है और उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।
- नियम 348 के तहत की गई प्रत्येक याचिका, प्रस्ताव या संदर्भ में स्पष्ट भाषा में उन तथ्यों का विवरण होगा जो अवमानना का गठन करते हैं, जिसके लिए आरोपित व्यक्ति को दोषी ठहराया गया है, और उस तिथि या तिथियों को निर्दिष्ट किया जाएगा जिस पर अवमानना कथित रूप से की गई है।
- जब याचिकाकर्ता अपने कब्जे में मौजूद किसी दस्तावेज या दस्तावेजों पर भरोसा करता है तो वह उन्हें याचिका के साथ दाखिल करेगा।
- अधिनियम के तहत कार्रवाई करने के लिए प्रत्येक याचिका एक शपथपत्र द्वारा समर्थित होगी और इन नियमों में प्रक्रिया, दस्तावेजों और शपथ पत्रों को दाखिल करने से संबंधित नियमों के प्रावधानों का अनुपालन करेगी।
याचिका की सुनवाई जस्टिस बीडी गुरु के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है,अधिनियम, 1971 की धारा 12(5) और उससे जुड़े स्पष्टीकरण के अनुसार, एनएचएआई एक आवश्यक पक्षकार है, एनएचएआई एक प्राधिकरण होने के नाते, प्राधिकरण या निगमित निकाय, राज्य को दिया गया आदेश वास्तव में उन व्यक्तियों को दिया गया आदेश है जो आधिकारिक तौर पर उसके कार्यों के संचालन के लिए जिम्मेदार हैं। जिन व्यक्तियों ने आदेश का पालन नहीं किया है, उन्हें पहले ही इस अवमानना कार्यवाही में प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जा चुका है। अवमानना कार्यवाही में प्राधिकरण, निगम निकाय को आदेश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि अवमानना कार्यवाही अपने स्वरूप से व्यक्तिगत कार्यवाही है और प्राधिकरण, निगम निकाय पर अधिनियम, 1971 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। सुस्थापित कानूनी प्रावधानों के मद्देनजर, एनएचएआई इस याचिका में एक आवश्यक पक्षकार नहीं है। इस टिप्प्णी के साथ याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छूट दी है, वह संबंधित जिन्होंने न्यायालयीन आदेश की अवहेलना की है, ऐसे व्यक्ति(यों), अधिकारी(यों) को शामिल करके एक नई अवमानना याचिका दायर कर सकता है।
याचिकाकर्ता अरविंद कुमार गोयल ने इनको बनाया था प्रमुख पक्षकार
. राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण।
. संतोष कुमार यादव, अध्यक्ष एनएचएआई।
. प्रदीप कुमार लाल, क्षेत्रीय अधिकारी, क्षेत्रीय कार्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़।
. मुकेश कुमार परघानिया, परियोजना निदेशक, परियोजना कार्यान्वयन इकाई, बिलासपुर, जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
. विशाल चौहान, सदस्य प्रशासन, एनएचएआई नई दिल्ली।
. रीना बाबा साहेब कंगाले सेक्रेटरी, डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यू एंड डिजास्टर मैनेजमेंट मंत्रालय छत्तीसगढ़।
. संजय अग्रवाल, कलेक्टर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
. मनीष साहू, उप मंडल अधिकारी (राजस्व) सह भूमि अधिग्रहण अधिकारी, बिलासपुर, जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़।