हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: रिलीव के बाद पुराने कार्यस्थल पर सेवा देना गैरकानूनी, वेतन का दावा नहीं कर सकता कर्मचारी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शासकीय कर्मचारियों के स्थानांतरण और कार्यमुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है, यदि किसी शासकीय सेवक को तबादला आदेश के बाद सक्षम प्राधिकारी द्वारा कार्यमुक्त कर दिया जाता है, तो उसके बाद पुराने स्थान पर उसकी उपस्थिति और कार्य को वैध नहीं माना जा सकता।
डिवीजन बेंच ने कहा कि वैध प्रशासनिक आदेश के बिना अपनी मर्जी से काम करने या केवल उपस्थिति पंजी में दस्तखत करने मात्र से कोई कर्मचारी उस अवधि के वेतन का हकदार नहीं हो जाता। सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए डिवीजन बेंच ने शिक्षक की याचिका को खारिज कर दिया है। उत्तर छत्तीसगढ़ सूरजपुर जिले के श्यामनगर पूर्व माध्यमिक शाला में पदस्थ प्रधान पाठक देसिया राम ने सिंगल बेंच के 30 मार्च 2026 के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने उनके 15 महीने के रोके गए वेतन का भुगतान करने संबंधी आदेश जारी करने से इनकार कर दिया था।
देसिया राम सूरजपुर जिले के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला हरिहरपुर ब्लॉक प्रेमनगर में प्रधान पाठक के पद पर कार्यरत थे। 30 जुलाई 2012 को विभाग ने उनका तबादला शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला श्यामनगर ब्लॉक प्रतापपु कर दिया। स्थानांतरण आदेा के परिपालन में BEO प्रेमनगर ने उन्हें 16 अगस्त 2012 को कार्यमुक्त कर दिया। तबादला आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने 29 अगस्त 2012 को तबादले पर अंतरिम रोक लगाते हुए आदेश दिया कि “यदि याचिकाकर्ता को अब तक कार्यमुक्त नहीं किया गया है, तो वह पुराने स्थान पर कार्य करता रहेगा। याचिकाकर्ता का कहना था कि वे 21 नवंबर 2013 को पुराने स्कूल से रिलीव हुए और 22 नवंबर 2013 को नए स्कूल में जॉइन किया। चूंकि उन्होंने 16 अगस्त 2012 से 21 नवंबर 2013 तक पुराने स्कूल हरिहरपुर में लगातार काम किया है और बच्चों को पढ़ाया है, इसलिए विभाग को इस अवधि का उनका रोका गया वेतन जारी करना चाहिए।
राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास ने याचिकाकर्ता के तर्कों का विरोध करते हुए डिवीजन बेंच को बताया, याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट से अंतरिम राहत मिलने से पहले ही 16 अगस्त 2012 को नियमानुसार कार्यमुक्त किया जा चुका था। चूंकि वे पहले ही रिलीव हो चुके थे, इसलिए कोर्ट द्वारा दिया गया अंतरिम राहत उन पर लागू ही नहीं होता था। इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने नए स्कूल में जॉइन नहीं किया और बिना किसी वैध प्राधिकार के स्वेच्छा से पुराने स्कूल में जमे रहे। उनके तबादले के खिलाफ पूर्व में दायर याचिका और अपील भी कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी है।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने शिक्षक की याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, एक बार जब सक्षम प्राधिकारी द्वारा कर्मचारी को कार्यमुक्त कर दिया गया, तो उस स्कूल या कार्यालय में उसकी सेवाएं समाप्त हो गई। उसके बाद वहां किया गया कोई भी कार्य प्रशासनिक रूप से शून्य माना जाएगा। अनाधिकृत रूप से पुराने स्कूल में उपस्थित रहना, बच्चों को पढ़ाना या उपस्थिति पंजी में नाम दर्ज करना वेतन का दावा करने का कानूनी अधिकार नहीं देता।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, याचिकाकर्ता को मालूम था कि वे 16 अगस्त 2012 को रिलीव हो चुके हैं, इसके बावजूद उन्होंने 29 अगस्त 2012 के सशर्त स्थगन आदेश की गलत व्याख्या कर अनुचित लाभ लेने का प्रयास किया और नियमों का उल्लंघन किया।