RTI और निजता का अधिकार: सरकारी कर्मचारी के पर्सनल रिकॉर्ड पर हाई कोर्ट का अहम फैसला

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बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद ने सूचना के अधिकार अधिनियम RTI Act, 2005 के तहत शासकीय कर्मचारियों की निजी जानकारी और सर्विस रिकॉर्ड साझा करने के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है, किसी लोक सेवक के व्यक्तिगत दस्तावेज मसलन, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, शैक्षणिक योग्यता, नियुक्ति के समय दिया गया हलफनामा और सर्विस रिकॉर्ड, उसकी व्यक्तिगत जानकारी के दायरे में आता है। कोर्ट ने जन सूचना अधिकारियों PIO को निर्देशित किया है कि जब तक किसी मामले में कोई बड़ा जनहित प्रमाणित न हो, तब तक आरटीआई के तहत ऐसी निजी जानकारियां साझा नहीं की जा सकती।

यह मामला रायगढ़ जिले के लैलूंगा तहसील में पदस्थ एक पटवारी की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रामनाथ सिंह की नियुक्ति 7 मार्च 2024 को पटवारी के पद पर हुई थी। वर्तमान में वे पटवारी हल्का नंबर 30, कामरगा में कार्यरत है। नियुक्ति के बाद, एक निजी संगठन क्राइम फ्री इंडिया फोर्स ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व)-सह-जन सूचना अधिकारी, लैलूंगा के समक्ष आरटीआई के तहत आवेदन प्रस्तुत किया। इस आवेदन में पटवारी रामनाथ सिंह के जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, शैक्षणिक दस्तावेज, हलफनामे और सर्विस रिकॉर्ड की कॉपियां मांगी गई।

अपनी निजी जानकारी के उजागर होने की आशंका को देखते हुए पटवारी ने छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सुरक्षा की गुहार लगाई। याचिका में मांग करते हुए कहा, उनके व्यक्तिगत दस्तावेज और गोपनीय सर्विस रिकॉर्ड तीसरे पक्ष को देने से रोका जाए, क्योंकि यह आरटीआई कानून की धारा 8(1)(j) के तहत छूट के दायरे में आता है।

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट मतीन सिद्दीकी व दानिश अहमद सिद्दीकी ने कहा, जो दस्तावेज मांगे गए हैं, वे पूरी तरह से व्यक्तिगत है और उनका किसी भी प्रकार की सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक जनहित से कोई संबंध नहीं है। अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, लोक सेवक का सर्विस रिकॉर्ड, योग्यता विवरण और संपत्ति का ब्यौरा व्यक्तिगत जानकारी है और यह प्रकटीकरण से मुक्त है। अधिवक्ता ने कहा, बिना किसी ठोस जनहित के ऐसी जानकारी देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता राजकुमार गुप्ता और छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग के अधिवक्ता श्याम सुंदर लाल टेकचंदानी ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा, याचिकाकर्ता की आशंका पूरी तरह से समयपूर्व है, क्योंकि जन सूचना अधिकारी ने अभी तक जानकारी साझा करने का कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। जन सूचना अधिकारी एक वैधानिक प्राधिकारी है जो स्वयं आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शक सिद्धांतों के तहत ही आवेदन का परीक्षण कर निर्णय लेगा।

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद माना कि चूंकि जन सूचना अधिकारी द्वारा अभी तक जानकारी देने का कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया है, इसलिए इस चरण पर सीधे रिट याचिका पर हस्तक्षेप करना जल्दबाजी होगी। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता की चिंताओं को वाजिब मानते हुए जन सूचना अधिकारी के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। जन सूचना अधिकारी का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह प्रत्येक आरटीआई आवेदन का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करे। अधिकारी को यह देखना होगा कि मांगी गई जानकारी व्यक्तिगत है या नहीं।

कोर्ट ने कहा, यदि मांगी गई जानकारी व्यक्तिगत प्रकृति की है और इसके प्रकटीकरण में कोई ठोस या बड़ा जनहित साबित नहीं होता है, तो ऐसी जानकारी आरटीआई आवेदक को बिल्कुल भी प्रदान नहीं की जाएगी। यदि सक्षम अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि जानकारी उजागर करना आवश्यक है, तो उसे इसके पीछे के ठोस कानूनी कारणों को दर्ज करते हुए तर्कसंगत आदेश पारित करना होगा।

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