दिनभर नौकरी, रातभर पढ़ाई… मेहनत, लगन और अनुशासन का नतीजा, रोहित व्यास की IAS बनने की प्रेरक कहानी

रोहित व्यास : एक ऐसा युवा, जिसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। नोएडा की एक बड़ी दूरसंचार कंपनी में नौकरी की, लेकिन मन में कुछ अलग करने का सपना था। नौकरी के साथ ही संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी शुरू की और पढ़ाई के लिए रात के तीन बजे से सुबह नौ बजे तक का वक्त चुना। तीन प्रयासों के बाद जब नतीजा आया तो मेहनत रंग लाई। रोहित व्यास ने 69वीं रैंक हासिल की और भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गए। सबसे खास बात यह थी कि जिस दिन उनका यूपीएससी का परिणाम आया, उसी दिन उनके पिता का जन्मदिन भी था। बेटे की सफलता उनके पिता के लिए शायद इससे बेहतर जन्मदिन का तोहफा नहीं हो सकता था। आज वही रोहित व्यास छत्तीसगढ़ कैडर के 2017 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में जशपुर जिले के कलेक्टर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
आईएएस बनने तक का उनका सफर सिर्फ परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है। इसमें एक छोटे शहर से निकलकर इंजीनियर बनने, निजी कंपनी में नौकरी करने, गांवों के बीच काम करने और फिर प्रशासनिक सेवा की ओर बढ़ने की कहानी भी छिपी है। आइए जानते हैं उज्जैन से निकलकर छत्तीसगढ़ प्रशासन में अपनी अलग पहचान बनाने वाले आईएएस अधिकारी रोहित व्यास की पूरी कहानी।
रोहित व्यास का जन्म 1990 में मध्यप्रदेश के उज्जैन में हुआ। महाकाल की नगरी उज्जैन में ही उनका बचपन बीता और शुरुआती शिक्षा भी यहीं से हुई। उनके पिता मदनलाल व्यास पुजारी हैं, जबकि उनकी मां उषा व्यास भारत संचार निगम लिमिटेड यानी बीएसएनएल में कार्यरत रही हैं और अब सेवानिवृत्त हो चुकी हैं।
रोहित परिवार में तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं। उनके दोनों छोटे भाई सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले रोहित ने बचपन से ही पढ़ाई को गंभीरता से लिया। शुरुआती शिक्षा से ही उनके अच्छे अंक रहे और आगे चलकर यही मेहनत उनके करियर की नींव बनी।
रोहित ने कक्षा पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई लोकमान्य तिलक स्कूल, पानदरीबा से की। पांचवीं कक्षा में उन्होंने 95 प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद छठवीं से दसवीं तक की पढ़ाई उन्होंने वर्जिन मेरी स्कूल से पूरी की। दसवीं बोर्ड परीक्षा में रोहित के 85.6 प्रतिशत अंक आए। इसके बाद उन्होंने गणित विषय के साथ उज्जैन पब्लिक स्कूल से 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की। बारहवीं में उन्होंने 82.4 प्रतिशत अंक हासिल किए। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद रोहित ने इंजीनियरिंग को अपना करियर बनाने का फैसला किया। उन्होंने इंदौर के वैष्णव कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन शाखा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और वर्ष 2011 में बीई की डिग्री पूरी की। इंजीनियरिंग में उनके लगभग 70 प्रतिशत अंक रहे। उस समय तक शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार की पढ़ाई करने वाला यह युवा आगे चलकर प्रशासनिक सेवा में जाएगा और देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक को पास करेगा।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद रोहित ने सीधे यूपीएससी की तैयारी शुरू नहीं की। उन्होंने पहले निजी क्षेत्र में काम करने का अनुभव हासिल किया। उन्हें नोएडा की दूरसंचार कंपनी एरिक्सन में नौकरी मिली। करीब तीन साल तक उन्होंने वहां काम किया और वर्ष 2014 तक नौकरी की। नौकरी के साथ-साथ उनके मन में कुछ अलग करने की इच्छा भी धीरे-धीरे मजबूत होती जा रही थी। यही वह दौर था, जब उनके जीवन की दिशा बदलने वाली एक महत्वपूर्ण घटना हुई। मई 2014 में रोहित का चयन केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप योजना के लिए हुआ। इस योजना के तहत उन्हें उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में काम करने का अवसर मिला। यहां ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते हुए उन्हें गांवों की वास्तविक समस्याओं को करीब से देखने और समझने का मौका मिला। गांवों का दौरा करते हुए रोहित का सामना उन समस्याओं से हुआ, जिनके बारे में शायद उन्होंने किताबों में पढ़ा था, लेकिन पहली बार उन्हें जमीन पर महसूस किया। ग्रामीण विकास, प्रशासन और सरकारी योजनाओं को लागू करने की प्रक्रिया को उन्होंने करीब से देखा। इसी दौरान उनका संपर्क प्रशासनिक अधिकारियों से भी हुआ। शायद यही वह मोड़ था, जब उनके मन में यह विचार मजबूत हुआ कि अगर व्यवस्था को बदलना है और लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाना है, तो प्रशासनिक सेवा के जरिए बड़ी भूमिका निभाई जा सकती है। यहीं से आईएएस बनने का सपना आकार लेने लगा।
रोहित ने नौकरी छोड़कर तैयारी करने के बजाय नौकरी के साथ ही संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी शुरू की। उनकी दिनचर्या बेहद कठिन थी। वह रात के तीन बजे उठकर पढ़ाई करते और सुबह नौ बजे तक तैयारी में जुटे रहते। इसके बाद सुबह दस बजे से नौकरी शुरू हो जाती। यानी दिन का बड़ा हिस्सा नौकरी में और रात का समय पढ़ाई में। यह दिनचर्या लंबे समय तक जारी रही। नींद कम थी, समय सीमित था और जिम्मेदारियां भी थीं, लेकिन लक्ष्य स्पष्ट था।
यूपीएससी की तैयारी के दौरान उन्होंने वैकल्पिक विषय के रूप में लोक प्रशासन को चुना। पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली। दूसरे प्रयास में भी मंजिल दूर रही, लेकिन रोहित ने हार नहीं मानी। आखिरकार तीसरे प्रयास में उनकी मेहनत सफल हुई। उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 69वीं रैंक हासिल की और भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित हो गए।
रोहित की सफलता की कहानी में सबसे भावुक क्षण वह था, जब यूपीएससी का परिणाम आया, जिस दिन रोहित के आईएएस बनने की खबर आई, उसी दिन उनके पिता का जन्मदिन भी था। एक तरफ पिता का जन्मदिन और दूसरी तरफ बेटे की सफलता। रोहित के लिए यह सिर्फ परीक्षा पास करने का दिन नहीं था। यह उनके वर्षों के संघर्ष, मेहनत और परिवार के सहयोग का परिणाम था। पिता के जन्मदिन पर आईएएस बनने की खबर शायद उनके लिए जीवन का सबसे यादगार तोहफा बन गई।
रोहित व्यास ने 28 अगस्त 2017 को भारतीय प्रशासनिक सेवा की जिम्मेदारी संभाली। प्रशिक्षण के बाद उनकी पहली फील्ड पोस्टिंग राजनांदगांव में सहायक कलेक्टर के रूप में हुई। इसके बाद उन्होंने केंद्र सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय में अवर सचिव के रूप में भी काम किया। केंद्र में काम करने के बाद वे छत्तीसगढ़ लौटे और जशपुर जिले के बगीचा में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व यानी एसडीएम की जिम्मेदारी संभाली। यहीं से उनके प्रशासनिक कामकाज की एक अलग शैली सामने आने लगी। बगीचा में एसडीएम रहते हुए रोहित व्यास ने सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए एक अलग पहल की। उन्होंने अपने अनुविभाग के शासकीय कार्यालयों में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी का नंबर लिखवाने के साथ अपना नंबर भी सार्वजनिक कराया। इस पहल का उद्देश्य साफ था। अगर किसी सरकारी कार्यालय में भ्रष्टाचार की शिकायत है, तो आम आदमी सीधे शिकायत कर सके। प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर उनकी यह पहल चर्चा में रही, लेकिन रोहित का प्रशासनिक काम सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा।
उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रयोग करने की कोशिश की।
बगीचा में रहते हुए रोहित ने बच्चों की शिक्षा को रोचक और प्रयोगात्मक बनाने के लिए मिशन कौतूहल शुरू किया। इस पहल के पीछे विचार था कि बच्चों को केवल किताबों और रटने के जरिए शिक्षा देने के बजाय उन्हें प्रयोग और गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाया जाए। कक्षा में पढ़ाई को रोचक बनाने और बच्चों में जिज्ञासा पैदा करने की कोशिश की गई। शायद यही कारण है कि रोहित के प्रशासनिक सफर में केवल सरकारी योजनाओं को लागू करने की भूमिका नहीं दिखती, बल्कि वह उन योजनाओं और व्यवस्थाओं में नए प्रयोग करने की कोशिश करते भी नजर आते हैं।
बगीचा के बाद रोहित को मुंगेली जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी यानी सीईओ की जिम्मेदारी मिली। यहां उन्होंने ग्रामीण विकास के साथ-साथ पर्यटन के क्षेत्र में भी काम किया। इसके बाद उनका तबादला बस्तर हुआ, जहां उन्होंने जिला पंचायत सीईओ के रूप में जिम्मेदारी संभाली। बस्तर जैसे आदिवासी और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र में काम करना उनके प्रशासनिक अनुभव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। यहां काम करने के बाद रोहित को भिलाई नगर निगम आयुक्त की जिम्मेदारी मिली। भिलाई नगर निगम आयुक्त के रूप में रोहित ने शहरी विकास से जुड़े कई क्षेत्रों पर काम किया। उनके कार्यकाल में बीपीओ कॉल सेंटर का निर्माण कराया गया, जिससे 500 से अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए। शहर की सफाई और सौंदर्यीकरण पर भी विशेष जोर दिया गया। इसके अलावा भिलाई में शहीद स्मारक के निर्माण की दिशा में भी काम हुआ। एक तरफ जहां ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने शिक्षा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर पहल की, वहीं शहर में जिम्मेदारी मिलने के बाद रोजगार, स्वच्छता और शहरी विकास पर ध्यान दिया। इसके बाद रोहित व्यास दुर्ग जिले में अपर कलेक्टर की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। रोहित इसके बाद सूरजपुर जिले के कलेक्टर बने। सरगुजा संभाग के इस जिले में प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालते हुए उनका ध्यान विकास के साथ-साथ पर्यटन को बढ़ावा देने पर रहा। कुदरगढ़ क्षेत्र में रोपवे विकसित करने और जिले के पर्यटन स्थलों को बेहतर बनाने की दिशा में भी प्रयास किए। अब वे जशपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले के कलेक्टर हैं और यहां जनसुविधा के लिए विशेष काम कर रहे हैं।
रोहित व्यास की कहानी यह बताती है कि आईएएस बनने का सपना सिर्फ एक परीक्षा पास करने से पूरा नहीं होता। उसके पीछे वर्षों की मेहनत, असफलताओं से लड़ने का हौसला और अपने लक्ष्य को लेकर लगातार बने रहने की जिद होती है। रात के तीन बजे शुरू होने वाली पढ़ाई से लेकर कलेक्टर की कुर्सी तक का यह सफर उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो नौकरी के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और जिन्हें लगता है कि सीमित समय और जिम्मेदारियों के बीच बड़ा सपना पूरा करना मुश्किल है। रोहित की कहानी शायद यही संदेश देती है कि रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत लगातार जारी रहे, तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता जरूर निकलता है।