11 जिलों में फूड सेफ्टी अफसरों के पद खाली, नकली पनीर के कारोबार पर कैसे लगेगी लगाम?

रायपुर : छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए बड़ा कदम उठाया है। राज्य में वनस्पति तेलों से बनने वाले एनालॉग पनीर पर रोक लगा दी गई है। लेकिन इस फैसले को जमीन पर उतारना आसान नहीं दिख रहा। प्रदेश के 11 जिलों में एक भी फूड सेफ्टी ऑफिसर (FSO – Food Safety Officer) तैनात नहीं है। सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर और कोंडागांव जैसे जिलों में पद खाली पड़े हैं। मनेंद्रगढ़, कोरिया, बलरामपुर, सूरजपुर, सारंगढ़ और शक्ति में भी कोई अफसर नहीं है।
खाद्य सुरक्षा कानूनों के तहत दुकानों से सैंपल लेने का अधिकार FSO को ही है। सैंपलिंग के बाद सैंपल को लैब भेजना और कार्रवाई करना इन्हीं की जिम्मेदारी है। अफसरों की अनुपस्थिति में बाजार में बिक रहे पनीर की जांच कौन करेगा? स्टाफ की कमी के कारण कई जिलों में पिछले छह सात महीनों से जांच पूरी तरह बंद है। इन जिलों का प्रभार 150 से 200 किलोमीटर दूर बैठे अफसरों को दिया गया है। इतनी दूरी से नियमित जांच या अचानक छापेमारी करना बेहद मुश्किल काम है।
विडंबना यह है कि जिलों में जगह खाली हैं, लेकिन दो अफसरों को राजधानी में अटैच किया गया है। रायपुर मुख्यालय में उन्हें प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं। राज्य में एनालॉग पनीर का रोजाना करीब 5 करोड़ रुपए का बड़ा कारोबार होता है। विभाग ने 12 इकाइयों को इसे बनाने का लाइसेंस दिया था। यह असली पनीर के मुकाबले काफी सस्ता होता है। यही कारण है कि बाजार में इसकी मांग बहुत अधिक है।
छत्तीसगढ़ में बनने वाला यह पनीर पड़ोसी राज्य ओडिशा में भी बड़ी मात्रा में भेजा जाता है। सरकार ने इन सभी 12 इकाइयों के लाइसेंस रद्द करने का निर्णय लिया है। एक्शन प्लान के तहत अधिकारियों को होटल, रेस्तरां और दुकानों की सघन जांच करनी होगी। असली पनीर के नाम पर एनालॉग पनीर बेचने वालों पर कानूनी मामला दर्ज किया जाएगा।
एनालॉग पनीर में पोषण और प्रोटीन की मात्रा बहुत कम होती है। इसमें इस्तेमाल होने वाले घटिया वनस्पति वसा स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डालते हैं। स्टार्च और अन्य मिलावटी तत्वों से पाचन तंत्र खराब हो सकता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और मरीजों के लिए यह पनीर ज्यादा खतरनाक माना जाता है। बिना जानकारी दिए इसे परोसना उपभोक्ता के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।