हाईकोर्ट ने खारिज की मोक्षित कॉरपोरेशन के शशांक चोपड़ा की याचिका, EOW-ACB की दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को चुनौती नहीं मिली सफलता

1154216-hc-high-court

बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने ‘हमार लैब’ योजना के अंतर्गत चिकित्सा उपकरणों व रीएजेंट्स की खरीदी में अनियमितताओं से जुड़े आपराधिक मामले में शशांक चोपड़ा की याचिका को खारिज कर दिया है। याचिककर्ता ने EOW, ACB रायपुर द्वारा दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी।

छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन CGMSCL द्वारा ‘हमार लैब योजना’ के तहत चिकित्सा उपकरणों और री,जेंट्स की खरीदी के लिए 26 अगस्त 2022 को टेंडर जारी किया गया था। अभियोजन के अनुसार, यह टेंडर सीजीएमएससीएल, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और मोक्षित कॉरपोरेशन व अन्य संस्थाओं के बीच आपराधिक षड्यंत्र के तहत मोक्षित कॉरपोरेशन को फायदा पहुंचाने के लिए तैयार किया गया था।

आरोप है कि अस्पतालों में बुनियादी ढांचे (जैसे कोल्ड स्टोरेज, फ्रिज, यूपीएस आदि) की कमी होने के बावजूद लगभग 314 करोड़ रुपये के रीएजेंट्स के परचेज ऑर्डर जारी कर दिए गए, जिसके परिणामस्वरूप अप्रैल 2025 तक लगभग 161 करोड़ रुपये के रीएजेंट्स बिना उपयोग के एक्सपायर हो गए और सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा।

इसके अलावा, ईडीटीए (EDTA) ब्लड कलेक्शन ट्यूब्स को अत्यधिक ऊंची कीमतों पर खरीदे जाने का भी आरोप है। इस मामले में 22 जनवरी 2025 को एसीबी/ऋ, ईओडब्ल्यू ने भादंवि की धारा 120-B, 409 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी। जांच के बाद मुख्य चार्जशीट 25 अप्रैल 2025 को और पूरक चार्जशीट 16 अप्रैल 2026 को विशेष न्यायालय (PC Act) रायपुर के समक्ष प्रस्तुत की गई।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, यह विवाद मूल रूप से एक अनुबंधीय और व्यावसायिक प्रकृति का है, जिसे आपराधिक रंग दिया गया है। कंपनी ने बुनियादी ढांचे की कमियों और रीजेंट्स के एक्सपायर होने की संभावना के बारे में पहले ही अधिकारियों को आगाह कर दिया था। इसके अलावा, सीजीएमएससीएल की ओर से लगभग 338 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है और कंपनी ने भारी-भरकम कर GST और आयकर चुकाए हैं। विवाद के समाधान के लिए मध्यस्थता Arbitration कार्यवाही भी लंबित है।

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता ने कहा कि यह मामला केवल अनुबंध के उल्लंघन का नहीं है, बल्कि सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग, टेंडर प्रक्रिया में हेरफेर, आपराधिक षड्यंत्र और भ्रष्टाचार का गंभीर आर्थिक अपराध है। तथ्यात्मक विवादों और बचाव के बिंदुओं पर परीक्षण (Trial) के दौरान ही विचार किया जा सकता है।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, आरोप केवल अनुबंध के उल्लंघन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक खरीदी प्रक्रिया में आपराधिक षड्यंत्र, टेंडर में हेरफेर और राजकोष को नुकसान पहुंचाने से जुड़े गंभीर आर्थिक अपराधों के प्रथम दृष्टया साक्ष्य हैं। कोर्ट ने कहा, मध्यस्थता या सिविल कार्यवाही लंबित होने मात्र से आपराधिक अभियोजन पर कोई रोक नहीं लगती, यदि कृत्य में स्वतंत्र रूप से आपराधिक तत्व शामिल हो। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ याचिका को खारिज कर दिया है।