अस्पताल की ड्यूटी के चलते कोर्ट नहीं पहुंच सके डॉक्टर, हाईकोर्ट ने 100 रुपये जुर्माना और विभागीय कार्रवाई का आदेश किया रद्द

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बिलासपुर : सरकारी अस्पताल में आपात और महत्वपूर्ण ड्यूटी के चलते अदालत में गवाही देने नहीं पहुंच सके डॉक्टर के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई और 100 रुपये के जुर्माने को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। कोर्ट ने माना कि डॉक्टर की अनुपस्थिति जानबूझकर नहीं थी और मरीजों की देखभाल तथा अस्पताल संचालन जैसी जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

मामले की सुनवाई जस्टिस एनके व्यास की सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने कहा कि चिकित्सकों की जिम्मेदारियां अन्य सरकारी कर्मचारियों से अलग और विशेष प्रकृति की होती हैं। ऐसे मामलों में अदालत को परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

मामला वर्ष 2008 का है। भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत चल रहे एक प्रकरण में डॉ. वीएके कोसरिया, तत्कालीन ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सरायपाली को अभियोजन गवाह के तौर पर अदालत में पेश होना था। उनकी गवाही के लिए 19 अगस्त 2008 की तारीख निर्धारित की गई थी।

हालांकि, जननी सुरक्षा योजना के तहत सरकारी राशि के वितरण से जुड़ी आवश्यक सरकारी ड्यूटी में व्यस्त होने के कारण डॉक्टर उस दिन अदालत नहीं पहुंच सके। इसके अलावा, शासकीय अस्पताल के प्रभारी होने के कारण उन पर अस्पताल से जुड़ी अन्य जिम्मेदारियां भी थीं।

डॉक्टर अगले ही दिन यानी 20 अगस्त 2008 को अदालत में उपस्थित हुए और अपनी गवाही दर्ज कराई। इसके बावजूद सत्र न्यायालय ने उसी दिन आदेश जारी करते हुए उन पर 100 रुपये का जुर्माना लगाया और विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए।

इस आदेश को डॉक्टर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि अदालत में अनुपस्थित रहने का कारण जानबूझकर कार्यवाही से बचना नहीं था, बल्कि तत्काल सरकारी जिम्मेदारी थी। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने उनके स्पष्टीकरण पर उचित विचार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि डॉक्टर ने सरकारी ड्यूटी के कारण अदालत में उपस्थित नहीं हो पाने की जानकारी दी थी। कोर्ट ने कहा कि मरीजों की देखभाल और सरकारी अस्पताल का संचालन भी डॉक्टर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इनके जरिए अस्पताल की आवश्यक जिम्मेदारियों को प्रभावित किए बिना डॉक्टर अदालत की कार्यवाही में शामिल हो सकते हैं।

हाईकोर्ट ने माना कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा 100 रुपये का जुर्माना लगाने और विभागीय कार्रवाई का निर्देश देना कठोर रवैया था।

इसके बाद हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय द्वारा 20 अगस्त 2008 को पारित आदेश को रद्द कर दिया।