इंदौर। मध्यप्रदेश में 20 वर्षीय युवती के जैन साध्वी बनने के फैसले को लेकर सामने आए मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। युवती ने सांसारिक जीवन त्यागकर श्वेतांबर जैन धर्म अपनाने और दीक्षा लेकर साध्वी बनने की इच्छा जताई थी, लेकिन उसके माता-पिता और रिश्तेदार इस फैसले का विरोध कर रहे थे। मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने कहा कि बालिग युवती को अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले लेने और अपनी इच्छा के अनुसार धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है।
युवती की ओर से अदालत में दायर याचिका में कहा गया कि उसने जैन धर्म का पालन करते हुए दीक्षा लेने और साध्वी के रूप में धार्मिक जीवन अपनाने का निर्णय लिया है। हालांकि, उसके माता-पिता और कुछ रिश्तेदार इस फैसले के खिलाफ हैं और कथित तौर पर उस पर निर्णय बदलने का दबाव बनाया जा रहा था। युवती ने अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस संरक्षण की मांग भी की थी।
इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने 7 सितंबर 2026 को युवती की रिट याचिका का निपटारा किया। कोर्ट ने कहा कि 20 वर्षीय याचिकाकर्ता भारत की नागरिक और बालिग है। वह अपनी इच्छा के अनुसार धर्म का पालन करने और अपनी मर्जी से जीवन जीने का फैसला कर सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि बेटी के प्रति माता-पिता के लगाव को देखते हुए उसके संन्यास लेने के फैसले पर उनकी आपत्ति को लेकर अदालत सहानुभूति रखती है। हालांकि, इससे बालिग युवती के अपने जीवन को लेकर निर्णय लेने के अधिकार पर असर नहीं पड़ता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि युवती के माता-पिता या कोई अन्य व्यक्ति उस पर किसी तरह का दबाव डालता है, तो वह संबंधित पुलिस थाने या अधिकारी से मदद मांग सकती है। ऐसी शिकायत मिलने पर सक्षम अधिकारी या थाना प्रभारी को संबंधित निर्देशों के अनुसार तत्काल कार्रवाई करनी होगी।
यानी अदालत ने इस मामले में युवती के बालिग होने और अपनी इच्छा के अनुसार जीवन व धर्म चुनने के अधिकार को आधार माना है।