‘आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता न बचे तो…’, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला को लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और हालात इस हद तक पहुंचा दिए जाते हैं कि उसे आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नजर नहीं आता, तो ऐसी परिस्थितियां आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के आरोप के आकलन में महत्वपूर्ण मानी जाएंगी।

मामला बिलासपुर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र का है। रश्मि प्रकाश ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद उनके भाई आशीष नाथ ने उनके पति डॉ. संजय प्रकाश के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। आरोप था कि पति द्वारा लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना किए जाने के कारण रश्मि ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मृतका के बेटे रोहित, बेटी तनिष्का और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। बच्चों ने आरोप लगाया कि उनके पिता के क्लीनिक में काम करने वाली एक नर्स से उनके संबंध थे। मां द्वारा इसका विरोध किए जाने पर पिता उनके साथ मारपीट करते थे।

बच्चों के मुताबिक, उनकी मां को पानी में नींद की गोलियां मिलाकर देने की बात भी सामने आई थी। घटना से एक दिन पहले भी उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई थी। गवाहों ने यह भी बताया कि डॉ. संजय अपनी पत्नी को तलाक देने और नर्स से शादी करने की धमकी देते थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में साक्ष्यों का मूल्यांकन अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि पूरे घटनाक्रम और परिस्थितियों को एक साथ देखकर किया जाना चाहिए। कोर्ट के अनुसार, लगातार प्रताड़ना के कारण यदि पीड़ित व्यक्ति को आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प दिखाई नहीं देता, तो यह तथ्य आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के आरोप के निर्धारण में महत्वपूर्ण हो सकता है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निचली अदालत ने गवाहों के बयानों का अलग-अलग आकलन किया था। जबकि सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों को एक साथ देखने पर मामले की पूरी तस्वीर सामने आती है।

इस मामले में निचली अदालत ने 28 जून 2016 को डॉ. संजय प्रकाश को IPC की धारा 498-ए के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने उन्हें तीन साल की सजा और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। हालांकि, आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण से जुड़ी धारा 306 के आरोप से उन्हें बरी कर दिया गया था।

इस फैसले को चुनौती देते हुए मृतका के भाई आशीष नाथ ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। वहीं, डॉ. संजय प्रकाश ने भी 498-ए के तहत मिली सजा के खिलाफ अपील की थी। हाईकोर्ट ने मामले में लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की परिस्थितियों को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के आरोप के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है।

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