बच्चे की पहचान और गरिमा सर्वोपरि, DNA रिपोर्ट के आधार पर पितृत्व पर सवाल उठाने से हाईकोर्ट का इनकार

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रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चे की वैधता, पितृत्व और पहचान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को कानूनी रूप से वैध संतान मानने की मजबूत धारणा होती है। केवल DNA रिपोर्ट के आधार पर इस वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती।

जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने बच्चे की पहचान और गरिमा को महत्वपूर्ण मानते हुए पति की अपील खारिज कर दी।

मामला दुर्ग जिले से जुड़ा है। संबंधित व्यक्ति का विवाह 5 मई 2005 को हुआ था। विवाह के दौरान एक बच्चे का जन्म हुआ। बाद में पति-पत्नी ने 15 नवंबर 2016 को आपसी सहमति से तलाक ले लिया।

तलाक से पहले भरण-पोषण से संबंधित कार्यवाही के दौरान बच्चे का DNA परीक्षण कराया गया था। DNA रिपोर्ट के आधार पर पति ने फैमिली कोर्ट में सिविल मुकदमा दायर कर बच्चे के स्कूल और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों से अपना नाम हटाने की मांग की। उसका दावा था कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है।

दुर्ग फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2025 को उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अपर्णा बनाम अरुण और ईवान बनाम मिलन मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 के तहत वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता के पक्ष में मजबूत कानूनी धारणा मौजूद है।

कोर्ट ने कहा कि इस धारणा को समाप्त करने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि बच्चे के गर्भधारण के समय पति और पत्नी के बीच एक-दूसरे तक पहुंच या सहवास की कोई संभावना नहीं थी। इस मामले में पति ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी।

कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि माता-पिता के बीच विवाद का खामियाजा बच्चे को नहीं भुगतना चाहिए। बच्चे को अदालत में उसकी वैधता पर सवाल उठाए जाने से संरक्षण मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की पहचान और वंशावली उसके निजी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। महज संदेह या DNA रिपोर्ट के आधार पर उसकी पहचान और पितृत्व को चुनौती देना उचित नहीं है, जब तक इसके लिए ठोस कानूनी आधार मौजूद न हो।