करका जंगल में 3,500 से अधिक क्षतिग्रस्त पेड़ों को बचाने का अभियान शुरू, कर्नाटक के विशेषज्ञ करेंगे उपचार

करका जंगल में बढ़ता अतिक्रमण और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई वन संरक्षण के लिए गंभीर चुनौती बन गई है। उपलब्ध आकलन के मुताबिक, वर्ष 2016 में जंगल के लगभग 22 हेक्टेयर क्षेत्र में अतिक्रमण था, जो 2026 में बढ़कर 102.47 हेक्टेयर तक पहुंच गया। वहीं, ड्रोन सर्वेक्षण और उपग्रह तस्वीरों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर वर्ष 2016 से 2026 के बीच 1.25 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई का अनुमान लगाया गया है।
अभियान में उन पेड़ों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिनके तनों की छाल चारों ओर से काट दी गई है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में गर्डलिंग कहा जाता है। इससे जड़ों और पेड़ के ऊपरी हिस्से के बीच पोषक तत्वों का प्रवाह बाधित हो सकता है, जिससे पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगता है।
विशेषज्ञ प्रत्येक पेड़ की स्थिति का आकलन करेंगे और उसके जीवित रहने की संभावना के आधार पर उपचार की विधि निर्धारित करेंगे। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक प्रभावित पेड़ों को बचाना है।
क्षति की गंभीरता के अनुसार पेड़ों के उपचार में ब्रिज ग्राफ्टिंग जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इस विधि के जरिए तने के क्षतिग्रस्त हिस्से के ऊपर और नीचे मौजूद जीवित ऊतकों के बीच दोबारा संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, ताकि पोषक तत्वों का प्रवाह बहाल हो सके।
हालांकि, सभी क्षतिग्रस्त पेड़ों को बचाना संभव नहीं है। इसलिए उपचार शुरू करने से पहले विशेषज्ञों द्वारा उनकी स्थिति का आकलन किया जाना महत्वपूर्ण होगा।
इस अभियान का उद्देश्य केवल क्षतिग्रस्त पेड़ों का उपचार करना नहीं, बल्कि वन विभाग के कर्मचारियों को भी पेड़ों की देखभाल की वैज्ञानिक तकनीकों से परिचित कराना है। प्रशिक्षण के माध्यम से वनकर्मी भविष्य में ऐसे पेड़ों की समय रहते पहचान कर सकेंगे और जरूरत के अनुसार उपचार की प्रक्रिया अपना सकेंगे।
विशेषज्ञों की निगरानी में वनकर्मियों की भागीदारी से अभियान को आगे बढ़ाने की योजना बनाई गई है, ताकि जंगल में पेड़ों के संरक्षण के प्रयासों को लगातार जारी रखा जा सके।
महानदी के उद्गम क्षेत्र से जुड़े करका जंगल में शुरू की गई यह पहल वन संरक्षण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। वृक्ष विशेषज्ञ विजय निशांत की तकनीकी विशेषज्ञता, वन विभाग के प्रयासों और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से प्रभावित क्षेत्र को फिर से हरा-भरा बनाने की उम्मीद है।
हालांकि, अभियान की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने क्षतिग्रस्त पेड़ों को बचाया जा सकेगा और भविष्य में पेड़ों की कटाई तथा अतिक्रमण पर किस हद तक प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।
