छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में बड़ा खेल! बिना परीक्षा और मूल्यांकन के 13 लाख छात्रों को दे दिए ग्रेड, 50 स्कूलों की जांच में खुलासा

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रायपुर : छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। हैरानी की बात यह है कि जिन छात्रों ने परीक्षा ही नहीं दी, जिन विषयों के प्रश्नपत्र तक तैयार नहीं हुए और जिनका मूल्यांकन भी नहीं किया गया, उनकी मार्कशीट में ग्रेड दर्ज कर दिए गए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत शुरू किए गए तीन नए विषयों को लेकर सामने आई इस गड़बड़ी ने प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा विषयों से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, इन विषयों की परीक्षा कई सरकारी स्कूलों में आयोजित ही नहीं की गई, लेकिन विद्यार्थियों की मार्कशीट में ग्रेड भर दिए गए। यह गड़बड़ी शैक्षणिक सत्र 2024-25 और 2025-26 में सामने आई है। इसका असर प्रदेश के करीब 13 लाख विद्यार्थियों की पढ़ाई और मूल्यांकन व्यवस्था पर पड़ने की आशंका है।

इस मामले की जांच के लिए प्रदेश के 11 जिलों के 50 सरकारी स्कूलों से जानकारी जुटाई गई। इनमें रायपुर, महासमुंद, गरियाबंद, बलौदाबाजार, जांजगीर, जगदलपुर, बीजापुर, जशपुर, नारायणपुर, दुर्ग और धमतरी के स्कूल शामिल हैं।

पड़ताल में सामने आया कि कई स्कूलों में तीनों नए विषयों की परीक्षा नहीं ली गई थी। सत्र 2024-25 में कक्षा तीसरी और छठवीं के विद्यार्थियों के साथ ऐसा हुआ, जबकि 2025-26 में चौथी और सातवीं के छात्रों की परीक्षा भी इन विषयों में नहीं कराई गई।

अगस्त और सितंबर में आयोजित तिमाही परीक्षाओं के लिए बाकायदा समय-सारणी जारी की गई थी, लेकिन उसमें इन तीनों विषयों को जगह नहीं दी गई। इसके बावजूद विद्यार्थियों की मार्कशीट में ग्रेड दर्ज होना पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।

शिक्षकों ने पड़ताल के दौरान बताया कि मार्कशीट में शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा के कॉलम पहले से मौजूद थे। ऐसे में उन्होंने कॉलम खाली छोड़ने के बजाय उनमें ग्रेड भर दिए।

कुछ शिक्षकों का तर्क था कि आठवीं तक विद्यार्थियों को फेल नहीं किया जाता, इसलिए इन विषयों की परीक्षा नहीं होने से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। हालांकि, सवाल यह है कि जब बच्चों की परीक्षा ही नहीं हुई और उनके ज्ञान का आकलन भी नहीं किया गया, तो उन्हें ग्रेड किस आधार पर दिए गए?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत विद्यार्थियों को पारंपरिक पढ़ाई के साथ खेल, कला और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने के उद्देश्य से तीन नए विषय शामिल किए गए हैं।

1. शारीरिक शिक्षा और कल्याण: इसमें खेलकूद, योग, पोषण और स्वस्थ जीवनशैली से जुड़ी जानकारी दी जानी है।

2. कला शिक्षा: इसके अंतर्गत संगीत, रंगमंच, कठपुतली, चित्रकला, मूर्तिकला, ग्राफिक डिजाइन और फोटोग्राफी जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

3. व्यावसायिक शिक्षा: इस विषय में विद्यार्थियों को बागवानी, ऑटोमोबाइल सर्विसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, अकाउंटिंग, बैंकिंग और रिटेल जैसे व्यावहारिक कौशल सिखाने की योजना है।

इन विषयों का पाठ्यक्रम राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने तैयार किया है। वहीं, पाठ्यपुस्तक निगम ने पिछले दो शैक्षणिक सत्रों में कुल 66.96 लाख किताबें छापकर जिलों तक पहुंचाई हैं।

पड़ताल में एक और गंभीर समस्या सामने आई है। कई सरकारी स्कूलों में इन विषयों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।

कला शिक्षा के लिए संगीत और चित्रकला के जानकार शिक्षकों की कमी है। शारीरिक शिक्षा के लिए पर्याप्त PTI नहीं हैं। वहीं, व्यावसायिक शिक्षा के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ शिक्षकों की जरूरत है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक ही उपलब्ध नहीं थे, तो विद्यार्थियों को इनकी पढ़ाई कैसे कराई गई? और जब पढ़ाई नहीं हुई तो मूल्यांकन किस आधार पर किया गया?

इस मामले में तीन अहम दस्तावेज सामने आए हैं। पहला, विद्यार्थियों की मार्कशीट, जिसमें तीनों विषयों के ग्रेड दर्ज हैं। दूसरा, तिमाही परीक्षा का टाइम-टेबल, जिसमें इन विषयों की परीक्षा का कोई उल्लेख नहीं है। तीसरा, SCERT की बैठक से जुड़ा दस्तावेज, जिसमें इन विषयों को अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात कही गई है। इस दस्तावेज पर समिति के आठ सदस्यों के हस्ताक्षर भी बताए गए हैं।

परीक्षा आयोजित नहीं होने के पीछे जिम्मेदारी को लेकर स्पष्ट निर्देशों का अभाव भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) को उम्मीद थी कि इन विषयों की परीक्षा भी अन्य विषयों की तरह जिला स्तर पर आयोजित की जाएगी। दूसरी ओर, जिला शिक्षा अधिकारी DPI के निर्देशों का इंतजार करते रहे।

इस असमंजस के चलते परीक्षा कराने की जिम्मेदारी तय नहीं हो सकी और स्कूलों में परीक्षा आयोजित नहीं हुई।

SCERT के उप संचालक और पाठ्यक्रम शाखा के प्रभारी कौस्तुभ चटर्जी ने कहा कि कला और योग जैसे विषयों को भी अन्य विषयों की तरह अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इनकी किताबें भी स्कूलों तक पहुंचाई गई हैं। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों का परिणाम परीक्षा और मूल्यांकन के आधार पर ही तैयार होना चाहिए। बिना मूल्यांकन के ग्रेड देना उचित नहीं है।

वहीं, लोक शिक्षण संचालनालय के उप संचालक अशोक बंजारा ने भी कहा कि जब विषय पाठ्यक्रम में शामिल हैं और उनकी किताबें स्कूलों को उपलब्ध कराई गई हैं, तो उनकी परीक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिला स्तर पर प्रश्नपत्र तैयार कराकर परीक्षा आयोजित की जा सकती है।

बंजारा के मुताबिक, कुछ शिक्षक अपनी कमियों को छिपाने के लिए अलग-अलग तर्क दे रहे हैं। इस मामले में दोबारा स्पष्ट निर्देश जारी करवाए जाएंगे।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब NEP के तहत नए विषयों को अनिवार्य किया गया, उनकी किताबें भी छापी गईं और विद्यार्थियों की मार्कशीट में ग्रेड भी दर्ज हुए, तो फिर परीक्षा और मूल्यांकन की जिम्मेदारी निभाने में चूक किस स्तर पर हुई?