सरगुजा में अधिग्रहित सरकारी जमीन की कर दी बिक्री, 29 साल बाद खरीदार को लगा झटका; हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को माना अमान्य

high court

सरगुजा : सरगुजा जिले में सरकारी जमीन की बिक्री का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। जल संसाधन विभाग द्वारा करीब चार दशक पहले अधिग्रहित की जा चुकी जमीन को एक महिला ने बेच दिया। इतना ही नहीं, पंजीयन कार्यालय में जमीन की रजिस्ट्री भी हो गई और खरीदार ने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने के बाद जमीन पर खेती शुरू कर दी तथा चारदीवारी भी बना ली। अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अधिग्रहित जमीन की बाद में हुई रजिस्ट्री से खरीदार को मालिकाना हक नहीं मिल सकता।

मामला ग्राम सुंदरपुर की खसरा नंबर 336/1 की जमीन से जुड़ा है। जल संसाधन विभाग ने 7 जून 1982 को इस जमीन का अधिग्रहण किया था। अधिग्रहण के बदले तत्कालीन भू-स्वामियों को मुआवजे का भुगतान भी कर दिया गया था। इसके बावजूद विभाग ने लंबे समय तक जमीन पर कब्जा नहीं लिया।

इसी का फायदा उठाकर पूर्व भू-स्वामी उर्वशी सिंह ने अधिग्रहित जमीन का एक हिस्सा पंकज अग्रवाल को बेच दिया। पंकज अग्रवाल ने 29 अप्रैल 2011 को 62 हजार रुपये में 0.121 हेक्टेयर जमीन की रजिस्ट्री कराई। बाद में जमीन का खसरा नंबर बदलकर 336/3 हो गया। खरीदार ने अपने नाम पर राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण कराया और जमीन पर खेती करने के साथ चारदीवारी भी खड़ी कर दी।

जल संसाधन विभाग को इस बिक्री की जानकारी तब मिली, जब विभाग सुंदरपुर में अपनी परियोजना शुरू करने की तैयारी कर रहा था और अधिग्रहित जमीन पर कब्जा लेने पहुंचा। इस दौरान पता चला कि सरकारी जमीन पर निजी व्यक्ति का कब्जा है और वहां खेती की जा रही है।

इसके बाद जल संसाधन विभाग के एसडीओ ने 19 फरवरी 2021 को कब्जाधारी को नोटिस जारी किया। नोटिस में 0.453 हेक्टेयर जमीन को 15 दिनों के भीतर खाली करने के निर्देश दिए गए। विभाग ने स्पष्ट किया कि जमीन का अधिग्रहण 1982 में ही पूरा हो चुका है और संबंधित भू-स्वामियों को मुआवजा भी दिया जा चुका है।

विभाग के नोटिस को पंकज अग्रवाल ने चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि उन्होंने जमीन की विधिवत रजिस्ट्री कराई है और राजस्व रिकॉर्ड में भी उनका नाम दर्ज है। ऐसे में उन्हें अतिक्रमणकारी नहीं माना जा सकता।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जमीन का अधिग्रहण पहले ही पूरा हो चुका था। पूर्व भू-स्वामी ने अधिग्रहित जमीन बेचकर खरीदार के साथ धोखाधड़ी की है। इसलिए बाद में हुई रजिस्ट्री के आधार पर जमीन पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया जा सकता।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम दामिनी वाधवा मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जमीन की खरीद-बिक्री से खरीदार को कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं होता।

हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित जमीन के अधिग्रहण की अधिसूचना 25 नवंबर 1980 को जारी हो चुकी थी, जबकि पंकज अग्रवाल ने वर्ष 2011 में जमीन खरीदी थी। ऐसे में बाद में कराई गई रजिस्ट्री के आधार पर वह जमीन पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकते।

हालांकि, कोर्ट ने खरीदार को धोखाधड़ी करने वाली विक्रेता उर्वशी सिंह के खिलाफ दीवानी और आपराधिक कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है। यानी जमीन तो नहीं मिली, लेकिन धोखाधड़ी के मामले में विक्रेता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला रहेगा।

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