खेल विभाग में खरीदी पर उठे सवाल: 200 रुपए की टी-शर्ट 490 में, 500 का जूता 1500 रुपए में खरीदा; 1.47 करोड़ की गड़बड़ी की शिकायत

रायपुर : छत्तीसगढ़ के खेल एवं युवा कल्याण विभाग में बस्तर और सरगुजा ओलंपिक के लिए खिलाड़ियों की सामग्री खरीदी को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। शिकायत के मुताबिक, खिलाड़ियों के लिए खरीदे गए ट्रैक सूट, टी-शर्ट, शॉर्ट्स और जूतों की कीमत बाजार दर से काफी अधिक दिखाई गई है। आरोप है कि मनमाने दाम पर सामग्री की खरीदी कर सरकारी खजाने को करीब 1.47 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया गया है। इस मामले में मुख्यमंत्री से शिकायत की गई है।
शिकायत में लगाए गए आरोपों के अनुसार, बस्तर और सरगुजा ओलंपिक के लिए खिलाड़ियों को उपलब्ध कराई जाने वाली सामग्री की खरीदी के लिए करीब 3 करोड़ रुपए का टेंडर जारी किया गया था। इसके लिए 10 सितंबर को जेम (GeM) पोर्टल के माध्यम से निविदा प्रक्रिया शुरू की गई। इसके बाद 21 अक्टूबर को रात करीब 10:30 बजे नेशनल प्रोडक्ट मार्ट, रायपुर को 2.89 करोड़ रुपए की सामग्री आपूर्ति का वर्क ऑर्डर जारी कर दिया गया।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस खरीदी में कई सामग्रियों की दरें सामान्य बाजार कीमतों से काफी ज्यादा रखी गईं। इससे सरकारी राशि के उपयोग को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शिकायत में अलग-अलग सामग्रियों की खरीदी दरों की तुलना दूसरे सरकारी विभागों और संस्थानों की दरों से की गई है।
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ट्रैक सूट: खेल विभाग ने प्रति नग 1800 रुपए की दर से खरीदा, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने 1200 रुपए, कांकेर के आदिवासी विकास विभाग ने 1000 रुपए और आगरा खेल विभाग ने 1100 रुपए में खरीदी की थी।
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टी-शर्ट: छत्तीसगढ़ में एक टी-शर्ट के लिए 490 रुपए भुगतान किए गए, जबकि नेशनल एजुकेशन सोसाइटी दिल्ली ने 200 रुपए और ओडिशा सरकार ने 250 रुपए प्रति नग की दर से खरीदी की थी।
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शॉर्ट्स (निक्कर): खेल विभाग ने एक शॉर्ट्स के लिए 485 रुपए खर्च किए, जबकि दिल्ली की नेशनल एजुकेशन सोसाइटी ने इसी तरह की सामग्री 200 रुपए में खरीदी थी।
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जूते: शिकायत के अनुसार, यूनीस्टार कंपनी के जूतों के लिए प्रति सेट 1500 रुपए का भुगतान किया गया, जबकि यही जूते ऑनलाइन बाजार में करीब 500 रुपए में उपलब्ध हैं।
इन दरों के आधार पर शिकायतकर्ताओं ने करीब 1.47 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाया है।
शिकायत में खरीदी की प्रक्रिया और भुगतान की समयसीमा को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। दस्तावेजों के मुताबिक, सामग्री की आपूर्ति से पहले नमूनों की जांच, लोगो, सील और डिजाइन का अनुमोदन जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। इसके बाद ही भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
विभागीय प्रक्रिया की जानकारी रखने वालों के अनुसार, इन सभी औपचारिकताओं को पूरा करने में सामान्यतः 10 दिन से अधिक का समय लग सकता है। ऐसे में शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि महज सात दिनों के भीतर करीब 3 करोड़ रुपए की सामग्री की आपूर्ति, नमूनों की जांच, डिजाइन की मंजूरी और बिल प्रस्तुत करने की प्रक्रिया कैसे पूरी कर ली गई।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि निविदा की समयसीमा दो बार बढ़ाई गई, लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि समयसीमा बढ़ाने से संबंधित प्रक्रिया का इस्तेमाल पसंदीदा वेंडर को दस्तावेज तैयार करने और लैब रिपोर्ट उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त समय देने में किया गया।
मामले को लेकर खेल एवं युवा कल्याण मंत्री अरुण साव ने कहा कि खरीदी प्रक्रिया जेम पोर्टल के माध्यम से की गई है, इसलिए गड़बड़ी की गुंजाइश कम है। हालांकि, उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही है।
मंत्री अरुण साव ने कहा, “हमने स्पष्ट रूप से कहा था कि इसमें गुणवत्ता के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। जेम के माध्यम से खरीदी की गई है, इसलिए गड़बड़ी की गुंजाइश कम है। फिर भी चेक करवा लेते हैं। अगर कोई गड़बड़ी की गई होगी तो निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी।”
फिलहाल, इस मामले में शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच और विभागीय पक्ष सामने आने के बाद ही खरीदी प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
