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पका तेल का धड़ल्ले से हो रहा इस्तेमाल, तनाव, हाई ब्लड प्रेशर व कैंसर का खतरा

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दुर्ग (चिन्तक)। बेरोजगारी बढऩे के साथ ही कई लोगों ने स्वयं का व्यवसाय शुरू कर दिया। जगह-जगह नाश्ता सेंटर खोल दिए गए। इस दुकानों के सामने गरमा गर्म जलेबी, समोसा, छोले भटूरे और कचौड़ी खाने लोगों का हुजूम कहीं भी देखा जा सकता है। शहर के कई होटलों, फास्टफूड सेंटर व ठेलों द्वारा ग्राहकों को विषाक्त भोजन परोसा जा रहा है। यहां एक बार उपयोग हो चुके खाद्य तेल को कई बार इस्तेमाल में लाया जा रहा है, जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है।

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऑथोरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) की माने तो एक बार इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल का उपयोग ज्यादा से ज्यादा दो से तीन बार कर सकते हैं। इससे अधिक इस्तेमाल करने पर यह विषाक्त हो जाता है। साथ ही कैंसर होने की संभावना भी बढ़ जाती है।  कोरोना काल में बेरोजगारी बढऩे के साथ ही कई लोगों द्वारा होटल, ढाबा व फास्टफूड का संचालन किया जा रहा है। इन संस्थानों में एक बार पके हुए तेल का कई बार इस्तेमाल किया जा रहा है। बार-बार इस्तेमाल किए हुए तेल से पकवान बनाने पर उससे दुर्गंध भी आने लगता है। रीयूज ऑयल या दोबारा इस्तेमाल किया जाने वाला तेल गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।

उच्च तापमान पर गर्म किया गए तेल में से जहरीले धुंआ निकलता है। इसलिए स्मोक प्वॉइंट तक पहुंचने तक ही इसे गर्म करना चाहिए। हर बार जब तेल गर्म किया जाता है तो उसके फैट पार्टिकल्स टूट जाते हैं। इससे ये अपने स्मोक प्वॉइंट तक पहुंच जाता है और बार-बार उपयोग किए जाने पर इसमें से दुर्गंध आने लगता है। जब ऐसा होता है तो बीमारी पैदा करने वाले पदार्थ हवा में और पक रहे भोजन में मिल जाते हैं। उच्च तापमान पर तेल में मौजूद कुछ फैट ट्रांस फैट में बदल जाते हैं। ट्रांस फैट हानिकारक फैट होते हैं जो हृदय रोग के खतरे को बढ़ाते हैं। जब तेल का दोबारा इस्तेमाल किया जता है तो ट्रांस फैट की मात्रा और भी बढ़ जाता है। इससे शरीर में कोलेस्ट्राल का लेवल बढ़ जाता है। भोजन में पाई जाने वाली नमी, वायुमंडलीय ऑक्सीजन, उच्च तापमान, हाइड्रोलिसिस, ऑक्सीकरण और पोलीमराइजेशन जैसी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करते हैं। ये प्रतिक्रिया उपयोग किए गए तेल, फैटी एसिड और रेडिकल जो मोनोग्लिसराइड्स, डाइग्लिसराइड्स और ट्राइग्लिसराइड्स को उत्पन्न करते हैं। ये उनकी रासायनिक संरचना को बदलते हैं और संशोधित करते हैं। बार-बार तलने के बाद बनने वाले इन यौगिकों की टॉक्सिसिटी शरीर में लिपिड के जमने की क्षमता को बढ़ा देती है। ऑक्सीडेटिव तनाव, हाई ब्लड प्रेशर और एथेरोस्क्लेरोसिस आदि का कारण बन सकती है। बार-बार उसी तेल के इस्तेमाल से वह तेल खराब हो जाता है। उसकी गंध नष्ट हो जाती है। उसमें कार्सिनोजेनिक सब्सटैंसेज यानी कैंसर पैदा करने वाले तत्व पनप जाते हैं। तेल में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स नष्ट हो जाते हैं। कड़ाही में बचे तले में जमे गंदे मॉलिक्यूल्स दोबारा इस्तेमाल करने पर उस खाने में चिपक जाते हैं और पेट के अंदर जाकर सेहत पर विपरीत असर दिखाते हैं। इससे इनडाइजेशन की समस्या हो सकती है।