न IVF की जरूरत, न किराये की कोख…सीधा चले आओ यहां, एक डिब्बा पेड़े से होगा बेऔलादों को बेबी
मथुरा. भगवान गिरिराज द्वापर काल से गोवर्धन धाम में मौजूद हैं. यहां उनकी सेवा पूजा बड़े चाव से की जाती रही है. भक्त उन्हें दूध और पेड़े का भोग लगाते हैं. कहा जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने जब इंद्र के प्रकोप से बृजवासियों को बचाया, तो सबसे पहले उन्होंने यहां दूध और पेड़े का भोग लगाया, तभी से यह परंपरा चली आ रही है. भगवान अगर अपने भक्त के भोग से प्रसन्न हो जाते हैं, तो संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं. गोवर्धन धाम मथुरा से करीब 30 किलोमीटर दूर है. यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर लीला रची थी. इसी पर्वत को उठाने के बाद इंद्र का मान मर्दन किया था.
चार घंटे सेवा श्रृंगार
इंद्र ने नाराज होकर बृजवासियों के ऊपर जुल्म ढाना शुरू कर दिया. कई दिन और रात तक घनघोर वर्षा की. श्री कृष्ण ने इनसे ब्रज वासियों को बचाया था. कृष्ण यहां गिरिराज जी के रूप में विराजमान हैं. यह मंदिर अपने भक्तों के लिए 20 घंटे तक खुला रहता है, ताकि कोई भक्त दर्शन से अछूता न रह जाए. गिरिराज मंदिर के सेवायत पुजारी रामबाबू कौशिक कहते हैं कि ये मंदिर द्वापर कालीन है. यहां भगवान श्री कृष्ण की उंगली पर पर्वत उठा हुआ है. भक्तों की आस्था को देखते हुए यह मंदिर 20 घंटे तक खुला रहता है, ताकि कोई भक्त या आए और उनके दर्शन किए बिना यहां से चला न जाए. इससे भगवान को भी बुरा लगता है. इसी वजह से यह मंदिर 20 घंटे खुला रहता है और चार घंटे ठाकुर का सेवा श्रृंगार होता है.
पुजारी रामबाबू कौशिक बताते हैं भगवान कृष्ण को दूध और पेड़ा अति प्रिय है. हर दिन यहां हजारों श्रद्धालु भगवान गिरिराज को दूध और पेड़े का भोग लगाते हैं. जो भी भक्त सच्चे मन से पूजा करता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. भगवान श्री कृष्ण ने यहां दूध और दही का दान किया था. इसलिए इस मंदिर को दानघाटी के नाम से भी जाना जाता है.