भूविस्थापितों के हक में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, नौकरी के मामले में SECL की नीति नहीं, राज्य की पुनर्वास नीति होगी प्रभावी

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने कोरबा जिले के ग्राम पाली के 23 भू-विस्थापित परिवारों को बड़ी राहत देते हुए SECL को उनके रोजगार दावों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। जस्टिस एनके चंद्रवंशी के सिंगल बेंच ने कहा है, भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार का मामला राज्य की पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति-2007 के अनुसार तय होगा, न कि कोल इंडिया की पुनर्वास नीति-2012 के आधार पर।

याचिकाकर्ताओं की जमीन कुसमुंडा विस्तार परियोजना के लिए वर्ष 2010 में अधिग्रहित की गई थी। SECL ने उनके रोजगार दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अधिग्रहित भूमि 0.54 एकड़ की निर्धारित कटऑफ सीमा से कम है। कोर्ट ने कहा है, राज्य की पुनर्वास नीति में ऐसी कोई न्यूनतम भूमि सीमा निर्धारित नहीं है। यदि किसी परिवार की पूरी कृषि भूमि अधिग्रहित हो गई है तो उसे रोजगार में प्राथमिकता देने का प्रावधान है।

याचिका की सुनवाई जस्टिस एनके चंद्रवंशी के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा है, राज्य सरकार की पुनर्वास नीति को वैधानिक संरक्षण प्राप्त है और वही प्रभावी रहेगी। कोर्ट ने यह भी माना कि भूमि गंवाने वालों के पुनर्वास और आजीविका का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है। कोर्ट ने SECL द्वारा पारित सभी अस्वीकृति आदेशों को निरस्त करते हुए निर्देश दिया है, याचिकाकर्ताओं अथवा उनके नामित पात्र पारिवारिक सदस्यों को रोजगार देने के संबंध में 45 दिनों के भीतर नया निर्णय लिया जाए।

पढ़िए हाई कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है

  • भूमि अधिग्रहण के समय लागू पुनर्वास नीति से तय होंगे अधिकार।
  • राज्य की पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति-2007 को दी प्राथमिकता।
  • पूरी जमीन अधिग्रहित होने पर रोजगार के दावे को नकारा नहीं जा सकता।
  • DRRC की बैठक राज्य नीति को बदल या निरस्त नहीं कर सकती।
  • SECL को 45 दिन में सभी मामलों पर नया निर्णय लेने का निर्देश।

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