लापरवाही पर हाई कोर्ट सख्त, अदालत का समय बर्बाद करने पर याचिकाकर्ता पर लगाया जुर्माना…
बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अदालती कामकाज और याचिकाओं के ड्राफ्टिंग में अधिवक्ताओं द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है, बिना बुनियादी जानकारियों (जैसे एफआईआर की तारीख) के अधूरी याचिकाएं दाखिल करना अदालत के कीमती समय को बर्बाद करना है। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने पुलिस में दर्ज एफआईआर को रद्द करने वाली याचिका को खारिज कर याचिकाकर्ता पर जुर्माना ठोक दिया है।
दुर्ग निवासी बसंत कुमार साहू ‘भानेरतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) की धारा 528 के तहत आपराधिक याचिका
दायर की थी। याचिकाकर्ता ने भिलाई पुरानी बस्ती थाने में अपने खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 296 (अश्लील कृत्य/गाली-गलौज) और 351(3) (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने याचिका के दस्तावेजों और प्रार्थना का अवलोकन किया, तो एक बड़ी तकनीकी खामी सामने आई। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने जिस एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी, पूरी याचिका और प्रेयर क्लॉज में उस एफआईआर के दर्ज होने की तारीख का कहीं कोई उल्लेख ही नहीं किया गया था।
कोर्ट ने कहा, याचिका में किए गए दावों और प्रार्थनाओं को देखने से स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ता ने एफआईआर की तारीख का उल्लेख तक नहीं किया है। इससे साफ पता चलता है कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता द्वारा यह याचिका बेहद लापरवाह तरीके से तैयार की गई है, जिससे अदालत का बेहद कीमती समय बर्बाद हुआ है। अदालत की नजर में यह प्रार्थना पूरी तरह दोषपूर्ण है। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ याचिका को खारिज कर दिया है।
डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज करने के साथ ही याचिकाकर्ता के सामने कड़ी शर्त रख दी है। पहले उसे इस लापरवाही के लिए दो हजार रुपये जुर्माना पटाना होगा। जुर्माने की राशि छत्तीसगढ़ बिलासपुर के तिफरा स्थित ‘शासकीय मूक-बधिर एवं दृष्टिबाधित विद्यालय’ को सहायता के रूप में हस्तांतरित करने का निर्देश रजिस्ट्री को दिया है।