बेदखली मामले में रेलवे को बड़ा झटका: हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज, नोटिस भी किया निरस्त
बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने अपने फैसले में कहा है, सरकारी या रेलवे की जमीनों से किसी भी अवैध कब्जाधारी को हटाने से पहले उसे कानून के तहत स्पष्ट कारणों के साथ नोटिस देना अनिवार्य है। कोर्ट ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे द्वारा जिला कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है।
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने बुधवारी बाजार निवासी असलम हुसैन को रेलवे की जमीन पर अवैध कब्जाधारी मानते हुए लोक परिसर (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत बेदखली का आदेश जारी किया था। बेदखली आदेश के खिलाफ असलम हुसैन ने जिला कोर्ट में अपील दायर की थी। 15 मई 2026 को जिला कोर्ट ने असलम हुसैन की अपील को स्वीकार करते हुए रेलवे के बेदखली आदेश को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने मामले को वापस सक्षम अधिकारी के पास भेज दिया था। जिला कोर्ट ने निर्देश दिया था कि रेलवे अधिनियम की धारा 4 के तहत उचित और स्पष्ट नोटिस जारी करे और कानून के अनुसार नए सिरे से मामले की सुनवाई करे।
जिला कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए रेलवे ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। रेलवे की ओर से पैरवी करते हुए केंद्र सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा ने अदालत में दलील दी कि जिला अदालत का आदेश पूरी
तरह त्रुटिपूर्ण है। उन्होंने तर्क दिया कि कब्जाधारी को धारा 4 के तहत बकायदा नोटिस तामील कराया गया था, लेकिन पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद उसने अपने बचाव में कोई सबूत पेश नहीं किया। रेलवे का कहना था कि वह व्यक्ति आज भी अवैध कब्जे में है और अदालत द्वारा मामले को दोबारा वापस भेजने से कार्यवाही में अनावश्यक देरी होगी।
याचिका की सुनवाई जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और जिला अदालत के आदेश का अध्ययन करने के बाद रेलवे की दलीलों को अमान्य कर दिया। हाई कोर्ट ने पाया कि जिला कोर्ट ने रिकॉर्ड की विस्तृत जांच के बाद यह पाया था कि रेलवे द्वारा जारी किया गया शुरुआती नोटिस कानूनन गलत था, क्योंकि उसमें उन विशिष्ट आधारों या कारणों का कोई जिक्र नहीं था जिसके तहत बेदखली की जानी थी।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही संबंधित कोई सबूत न दे पाया हो, लेकिन प्राकृतिक न्याय का यह मूल सिद्धांत है कि किसी के खिलाफ भी दंडात्मक आदेश पारित करने से पहले उसे एक वैध और स्पष्ट कारणों वाला नोटिस दिया जाना जरूरी है। हाई कोर्ट ने माना कि जिला कोर्ट का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत और कानूनी रूप से सही है, तथा इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने रेलवे की याचिका को खारिज कर दिया।