जंतर-मंतर लाठीचार्ज मामला: सुप्रीम कोर्ट नाराज, CJI ने कहा- प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज उचित नहीं

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दिल्ली : NEET छात्र आंदोलन के दौरान दिल्ली के जंतर-मंतर पर पुलिस द्वारा की गई लाठीचार्ज की घटना पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस हुई। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान पुलिसिया बल प्रयोग पर सख्त एतराज जताया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को शांतिपूर्ण आंदोलन करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है और केवल प्रदर्शन होने के आधार पर पुलिस के अत्यधिक बल प्रयोग को जायज नहीं ठहराया जा सकता। शीर्ष अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जंतर-मंतर घटना और देश भर में छात्रों पर हुई कार्रवाई से जुड़ी सभी याचिकाओं पर मंगलवार को विस्तृत सुनवाई करने का फैसला किया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट के समक्ष पुलिस की बर्बरता का मुद्दा उठाते हुए कड़े कदम उठाने की मांग की। एडवोकेट फौजिया शकील और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि दिल्ली ही नहीं, बल्कि बिहार समेत देश के कई हिस्सों में प्रदर्शनकारी छात्रों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया जा रहा है। वकीलों ने दावा किया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान एके-47 और घातक हथियारों तक की मौजूदगी देखी गई। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि पूरे देश में प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक समान प्रोटोकॉल और रोक-टोक रहित व्यवस्था की आवश्यकता है, ताकि असामाजिक तत्वों से सख्ती से निपटा जा सके लेकिन आम छात्रों की आवाज को दबाया न जाए।

अदालत में केवल छात्रों का पक्ष ही नहीं गूंजा, बल्कि हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों का पक्ष रखने भी वकील पहुंचे। पुलिसकर्मियों के वकीलों ने पीठ से आग्रह किया कि इस मामले में उनका पक्ष भी सुना जाना चाहिए क्योंकि प्रदर्शन के नाम पर भीड़ ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों की लिंचिंग तक करने की कोशिश की थी। इस बहस पर हस्तक्षेप करते हुए जस्टिस जॉयमाला बागची ने बेहद मानवीय टिप्पणी की और कहा कि समाज में हर एक व्यक्ति के जीवन का समान मूल्य होता है, चाहे वह आम नागरिक हो, छात्र हो या सुरक्षाबल का जवान। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वासन दिया कि सरकार मामले की निष्पक्ष जांच और प्रोटोकॉल तय करने में कोर्ट का पूरा सहयोग करेगी।

इस समूचे विवाद की जड़ 20 जुलाई को आयोजित वह छात्र प्रदर्शन है, जब देश भर से आए अभ्यर्थियों और विभिन्न संगठनों ने नीट परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर डेरा डाला था। संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों को रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग की थी, जिसके बाद दोनों पक्षों में तीखी झड़प हो गई। छात्रों का आरोप है कि पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और पैलेट गन का इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, पुलिस का दावा है कि उग्र भीड़ ने सुरक्षा घेरा तोड़कर उपद्रव करने का प्रयास किया था, जिसके चलते कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीमित बल प्रयोग अनिवार्य हो गया था।

जंतर-मंतर पर हुई इस हिंसक झड़प की गूंज केवल अदालत तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि संसद के मानसून सत्र में भी इस पर जोरदार हंगामा हुआ। कांग्रेस के कन्याकुमारी से सांसद विजय वसंत ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर इस विषय पर तत्काल चर्चा कराने की मांग रखी। विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया कि सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों और पुलिस बल ने निहत्थे छात्रों व महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बर्बरता की। विपक्षी नेताओं ने गृह मंत्रालय से जवाबदेही तय करने और दोषी अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है, जिससे सरकार पर चौतरफा प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव बन गया है।

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