बेल आदेश के बावजूद आरोपी को जेल भेजा, कोर्ट ने तहसीलदार और पुलिस को लगाई फटकार

रायगढ़ : जमानत स्वीकार होने के बाद भी 4 दिन तक जेल में रखे जाने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है। घरघोड़ा तहसील के तहसीलदार और पुलिस की इस संयुक्त कार्रवाई को कोर्ट ने अवैध और मनमानीपूर्ण करार देते हुए याचिकाकर्ता अशरफ बेग को ₹25,000 मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा।
अशरफ बेग 49 वर्ष, निवासी घरघोड़ा, को 25 अक्टूबर 2025 को फिरोज कश्यप की शिकायत पर घरघोड़ा थाने बुलाया गया था। यहां पुलिस ने समझौता करने का दबाव बनाया। इनकार करने पर BNSS धारा 170/126 और 135(3) के तहत इस्तगासा 63/2025 बनाकर अशरफ को कार्यपालिक दंडाधिकारी/तहसीलदार घरघोड़ा के सामने पेश किया।
तहसीलदार ने 1 लाख रुपये का बेल बॉन्ड देने पर रिहा करने का आदेश दिया। अशरफ बेग ने उसी दिन बेल राशि जमा कर दी, मगर यहां भी खेला हुआ
आरोप है कि तहसीलदार ने बेल स्वीकार कर रिहा करने के बजाय बेल बॉन्ड के सत्यापन का बहाना बनाकर फाइल राजस्व निरीक्षक को भेज दी। इसके चलते याचिकाकर्ता को अशरफ बेग को 25 से 29 अक्टूबर 2025 तक अवैध रूप से जेल में रखा गया।
अशरफ बेग ने अधिवक्ता के जरिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर में रिट याचिका दायर की। सुनवाई में ये बिंदु रखे गए:
1. गैर-संज्ञेय मामला: न FIR थी न कोई संज्ञेय अपराध।
2. कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन: BNSS 170 के तहत निवारक गिरफ्तारी सिर्फ 24 घंटे की हो सकती है।
3. अनुच्छेद 21 का हनन: बेल बॉन्ड के बाद भी 4 दिन जेल में रखना जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है|
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई की। उन्होंने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, डी.के. बासु, और महमूद नय्यर आजम मामलों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस आधार और बिना नोटिस जारी किए मनमाने ढंग से की गई गिरफ्तारी नागरिकों की गरिमा और स्वतंत्रता को ठेस पहुँचाती है।
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि यह रिमांड एक न्यायिक आदेश के तहत था, जिसे अदालत ने खारिज करते हुए कहा कि गैर-संज्ञेय या जमानती मामलों में बिना जांच शुरू हुए किसी भी व्यक्ति को रूटीन तरीके से जेल नहीं भेजा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आधार और नोटिस के मनमानी गिरफ्तारी नागरिकों की गरिमा पर चोट है। राज्य सरकार के “न्यायिक रिमांड” वाले तर्क को भी खारिज किया।
उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए तहसीलदार और पुलिस की इस संयुक्त कार्रवाई को अवैध, मनमानीपूर्ण और संवैधानिक अधिकारों का हनन करार दिया।
अवैध निरोध और मानहानी के एवज में राज्य शासन को ₹25,000/- (पच्चीस हजार रुपये) का मुआवजा याचिकाकर्ता को देने का आदेश दिया। राज्य सरकार को यह राशि 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता अशरफ बेग को प्रदान करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह फैसला अधीनस्थ कार्यपालिक दंडाधिकारियों और पुलिस तंत्र की मनमानी रोकने के लिए एक बड़ा संदेश है कि प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।