हाई कोर्ट ने साफ किया: अवैध कब्जे पर बने निर्माण के टूटने पर नहीं मिलेगा कोई मुआवजा

बिलासपुर। अधिग्रहित जमीन पर कब्जा कर घर व दुकान बनाकर रह रहे एक व्यक्ति ने मकान व दुकान को तोड़े जानक के बाद छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मुआवजा की मांग की थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, अवैध कब्जे पर बना मकान या दुकान को तोड़े जाने की स्थिति में मुआवजा नहीं मिलेगा। SECL के अधिवक्ता ने अधिग्रहण के संबंध में कोर्ट को जानकारी दी।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने कोरबा के गेवराबस्ती-सर्वमंगला नगर में सड़क चौड़ीकरण के दौरान मकान और दुकान तोड़े जाने के मामले में मुआवजा व पुनर्वास की मांग को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जिस जमीन पर याचिकाकर्ता ने मकान और दुकान का निर्माण किया था, वह पहले ही अधिग्रहित हो चुकी थी। इसके बाद अधिग्रहित भूमि के एक हिस्से पर बिना किसी वैध अधिकार के कब्जा कर निर्माण किया गया। ऐसे अवैध कब्जे को हटाए जाने पर मुआवजा या पुनर्वास का कानूनी अधिकार नहीं बनता।
कोरबा निवासी 74 वर्षीय उदयभान जायसवाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर हसदेव राइट बैंक नहर रोड के किनारे स्थित अपने मकान, दुकान और आंगन को तोड़े जाने के बदले मुआवजा देने की मांग की थी। उन्होंने दावा किया था कि उनकी पैतृक जमीन वर्ष 1973 में हसदेव राइट बैंक नहर निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी। बाद में सिंचाई विभाग की सहमति से परिवार ने शेष भूमि पर मकान बनाया था और उनके पास अनापत्ति प्रमाणपत्र भी था। वर्ष 2021 में सड़क चौड़ीकरण के दौरान मकान तोड़े जाने के बाद उन्होंने मुआवजा और पुनर्वास की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान एसईसीएल और नगर निगम की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया, संबंधित भूमि पहले ही अधिग्रहित हो चुकी थी। याचिकाकर्ता ने बाद में अधिग्रहित भूमि के हिस्से पर अनधिकृत कब्जा कर मकान और दुकान बना ली थी। नगर निगम ने सड़क चौड़ीकरण परियोजना के दौरान अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई की।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता की पैतृक भूमि का अधिग्रहण पहले ही हो चुका था और उसके लिए कानून के अनुसार मुआवजा भी दिया गया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अधिग्रहित भूमि के हिस्से पर अनधिकृत रूप से कब्जा कर निर्माण किया। निर्माण हटाने के लिए अधिकारियों ने उसे हटाने के लिए कहा था, लेकिन उसके ऐसा नहीं करने पर नगर निगम ने सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत अतिक्रमण हटा दिया।
कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के 2026 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी जमीन पर लंबे समय तक कब्जा रहने से कब्जेदार को वैध अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। जब तक अतिक्रमण का नियमितीकरण नहीं होता या सरकार की ओर से वैध पट्टा अथवा अन्य कानूनी दस्तावेज जारी नहीं होता, कब्जा अवैध ही माना जाएगा। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने मुआवजा संबंधी मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।