OBC महिला कोटे में पुरुषों की भर्ती पर हाई कोर्ट सख्त, आरक्षण नियमों के खिलाफ हुई नियुक्ति, नगर निगम देगा 3 लाख मुआवजा

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नगर निकायों में सहायक शिक्षक शिक्षा कर्मी ग्रेड-3 की भर्ती से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की सिंगल बेंच ने माना कि महिला OBC वर्ग के लिए आरक्षित 12 पदों पर पुरुष अभ्यर्थियों की नियुक्ति करना आरक्षण नियमों के खिलाफ था। हालांकि, नियुक्तियों को हुए करीब 12 साल बीत जाने और संबंधित अभ्यर्थियों के लंबे समय से सेवा में रहने को देखते हुए कोर्ट ने उनकी नियुक्तियां रद्द नहीं कीं। इसके बजाय रायपुर नगर निगम को याचिकाकर्ता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
धमतरी जिले के मगरलोड क्षेत्र के ग्राम धौराभाठा निवासी नम्रता देवांगन ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने वर्ष 2013 में सहायक शिक्षक शिक्षा कर्मी ग्रेड-3 के विज्ञान विषय के पद के लिए आवेदन किया था। भर्ती प्रक्रिया में कुल 204 पद थे, जिनमें 12 पद OBC महिला वर्ग के लिए आरक्षित थे।
याचिकाकर्ता को 60.70 अंक मिले थे और मेरिट सूची में उनका स्थान 1594 था। उनका आरोप था कि महिला OBC के लिए आरक्षित 12 पदों पर महिला अभ्यर्थियों की नियुक्ति करने के बजाय पुरुष OBC अभ्यर्थियों को नियुक्त कर दिया गया।
इस मामले को लेकर उन्होंने वर्ष 2016 में हाई कोर्ट का रुख किया। कोर्ट के निर्देश पर गठित तीन सदस्यीय समिति ने मामले की जांच की। समिति की रिपोर्ट में भी माना गया कि आरक्षण नियमों के विपरीत नियुक्ति किए जाने के कारण याचिकाकर्ता को अवसर से वंचित होना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2018 में वर्तमान याचिका दायर की गई।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वर्ष 2013 की शिक्षक भर्ती प्रक्रिया के नियम 6(5) में महिलाओं समेत विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी सर्कुलर के जरिए वैधानिक नियमों को बदला या दरकिनार नहीं किया जा सकता।
यदि वैधानिक नियम महिला OBC वर्ग के लिए आरक्षित पदों को पुरुष अभ्यर्थियों से भरने की अनुमति नहीं देते हैं, तो केवल एक सर्कुलर के आधार पर ऐसी नियुक्तियों को वैध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित अभ्यर्थियों की नियुक्तियां 15 जनवरी 2014 को हुई थीं और वे वर्ष 2026 तक करीब 12 वर्षों से सेवा में हैं। वहीं, याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 2020 में शिक्षक (गणित) के पद पर हो चुकी है और उनकी सेवाएं भी नियमित हो गई हैं।
ऐसी स्थिति में वर्षों पुरानी नियुक्तियों को रद्द करने से संबंधित कर्मचारियों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। इसलिए हाई कोर्ट ने नियुक्तियों को बरकरार रखने का फैसला किया।
हाई कोर्ट ने माना कि भर्ती प्रक्रिया में नगर निगम की गलती के कारण याचिकाकर्ता को वर्ष 2014 में मिलने वाली नियुक्ति नहीं मिल सकी। यदि उन्हें उस समय नियुक्ति मिल जाती, तो उन्हें वेतन और अन्य सेवा लाभ प्राप्त होते। इस वजह से उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ी।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने संबंधित नियुक्तियों को रद्द करने के बजाय रायपुर नगर निगम को याचिकाकर्ता नम्रता देवांगन को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।