हरतालिका तीज पर भद्रा का साया, किस समय पूजा करने से मिलेगा फल

shiv parvati

हरतालिका तीज 2026: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष धार्मिक महत्व है। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं अविवाहित कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की इच्छा से भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करती हैं।

हरतालिका तीज हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस वर्ष यह पर्व 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं अन्न और जल का त्याग कर करीब 24 घंटे तक कठिन व्रत रखती हैं। हालांकि, इस बार तृतीया तिथि और भद्रा काल को लेकर असमंजस की स्थिति है। ऐसे में पूजा और पारण का सही समय जानना बेहद जरूरी है।

पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि 13 सितंबर 2026 की सुबह 07:07 बजे शुरू हुई और 14 सितंबर की सुबह 07:07 बजे समाप्त हो रही है। धार्मिक मान्यताओं में उदया तिथि को प्राथमिकता दी जाती है। इसी आधार पर इस वर्ष हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर को रखा जा रहा है।

व्रती महिलाएं इस दिन निर्जला उपवास रखेंगी और भगवान शिव-माता पार्वती का पूजन करेंगी। प्रदोष काल में शिव-पार्वती की पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है।

ज्योतिष में भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है। मान्यता है कि भद्रा के दौरान मांगलिक कार्य और विशेष पूजा करने से बचना चाहिए।

इस वर्ष 14 सितंबर को शाम 07:20 बजे से भद्रा शुरू होगी, जो 15 सितंबर 2026 की सुबह 07:44 बजे तक रहेगी। इसलिए व्रती महिलाओं को कोशिश करनी चाहिए कि भद्रा शुरू होने से पहले ही पूजा संपन्न कर लें।

हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त

हरतालिका तीज पर सुबह और शाम दोनों समय पूजा का विधान है।

  • सुबह पूजा का मुहूर्त: सुबह 06:05 बजे से 07:06 बजे तक
  • प्रदोष काल: शाम 05:43 बजे से 07:13 बजे तक
  • भद्रा प्रारंभ: शाम 07:20 बजे

भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए प्रदोष काल को विशेष शुभ माना जाता है। ऐसे में शाम की पूजा 05:43 बजे से 07:13 बजे के बीच पूरी कर लेना उचित रहेगा।

हरतालिका तीज के व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद करने की परंपरा है। लेकिन इस बार 15 सितंबर की सुबह तक भद्रा का प्रभाव रहेगा। ऐसे में भद्रा समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलने की बात कही गई है।

15 सितंबर 2026 को सुबह 07:44 बजे भद्रा समाप्त होगी। इसके बाद ही व्रती महिलाएं व्रत का पारण कर सकती हैं। पारण के समय जल ग्रहण करने के साथ दान-पुण्य करने की भी परंपरा है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने हिमालय पर्वत पर लंबे समय तक कठोर तपस्या की। उन्होंने अन्न और जल का त्याग कर भगवान शिव की आराधना की।

माता पार्वती के पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे। जब पार्वती को इसकी जानकारी मिली तो वह चिंतित हो गईं। उनकी सखियां उन्हें अपने साथ घने जंगल में ले गईं और वहां छिपा दिया। संस्कृत में ‘हरत’ का अर्थ हरण और ‘आलिका’ का अर्थ सखी माना जाता है। इसी वजह से इस व्रत को हरतालिका कहा गया।

मान्यता है कि जंगल में माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन मिट्टी और रेत से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा की। उनकी कठोर तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।

तभी से हरतालिका तीज को अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और पति-पत्नी के प्रेम का प्रतीक माना जाता है। आज भी महिलाएं इस दिन मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करती हैं और कई जगह रातभर जागरण कर भजन-कीर्तन व व्रत कथा का आयोजन किया जाता है।

हरतालिका तीज के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए निर्जला व्रत का संकल्प लें।

पूजा स्थल को साफ कर चौक या मंडप सजाएं। इसके बाद काली मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाकर स्थापित करें।

माता पार्वती को लाल चुनरी और सुहाग की सामग्री अर्पित करें। भगवान शिव को बेलपत्र, भांग, धतूरा और शमी पत्र चढ़ाएं। पूजा के दौरान हरतालिका तीज की व्रत कथा का श्रवण करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें और परिवार के बुजुर्गों का आशीर्वाद लें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने से व्रत का पुण्य फल प्राप्त होता है।