चार दशक बाद जमीन के उपयोग का बदला तरीका, 7 श्रेणियों में तय हुई प्रतिबंधित गतिविधियां

नए नियमों में सबसे अहम बदलाव भूमि उपयोग की विभिन्न श्रेणियों में गतिविधियों को अनुमति देने की व्यवस्था को लेकर किया गया है। अब किसी गतिविधि को अनुमति देने के लिए केवल यह देखना जरूरी नहीं होगा कि उसका नाम अनुमति वाली सूची में शामिल है या नहीं। इसके बजाय, यदि कोई गतिविधि संबंधित भूमि उपयोग श्रेणी की प्रतिबंधित गतिविधियों की सूची में शामिल नहीं है, तो उसे सामान्य तौर पर अनुमति योग्य माना जाएगा।
हालांकि, भूमि उपयोग की अनुमति मिलने का अर्थ यह नहीं है कि अन्य सभी कानूनी मंजूरियां भी स्वतः मिल जाएंगी। भवन निर्माण, पर्यावरण, अग्नि सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और अन्य लागू कानूनों के तहत जरूरी अनुमतियां लेना अनिवार्य रहेगा।
राजपत्र में नियम 38 के उप-नियम (1) में संशोधन किया गया है। इसके अनुसार अलग-अलग भूमि उपयोग श्रेणियों में उन सभी गतिविधियों को अनुमति योग्य माना जाएगा, जो उस श्रेणी के लिए निर्धारित प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल नहीं हैं।
यानी व्यवस्था अब ‘क्या अनुमति है’ से बदलकर ‘क्या प्रतिबंधित है’ के आधार पर काम करेगी।
संशोधित प्रावधानों में भूमि उपयोग की सात प्रमुख श्रेणियां तय की गई हैं—
- आवासीय
- वाणिज्यिक
- औद्योगिक
- सार्वजनिक एवं अर्ध-सार्वजनिक
- परिवहन
- आमोद-प्रमोद
- कृषि
हर श्रेणी के लिए अलग-अलग प्रतिबंधित गतिविधियों की सूची निर्धारित की गई है।
आवासीय भूमि पर हरित, नारंगी और लाल श्रेणी के उद्योगों के साथ गैस गोदाम, कबाड़खाने, संक्रामक रोगों के अस्पताल, जेल, बड़े परिवहन टर्मिनल और थोक व्यापार जैसी गतिविधियां प्रतिबंधित रहेंगी।
इसके अलावा तेल डिपो, पेट्रोलियम और ज्वलनशील पदार्थों का भंडारण, पशुपालन, मछली पालन, डेयरी, कचरा पालन और खनन जैसी गतिविधियों पर भी रोक रहेगी।
वाणिज्यिक भूमि पर नारंगी, लाल और नीली श्रेणी के उद्योगों को प्रतिबंधित किया गया है। खतरनाक या जहरीले रसायनों का भंडारण, विस्फोटक पदार्थों का भंडारण, पशुपालन, मछली पालन, डेयरी और कचरा पालन जैसी गतिविधियां भी प्रतिबंधित रहेंगी।
वध से जुड़ी गतिविधियां, कब्रिस्तान और खनन भी इस श्रेणी में प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल हैं।
औद्योगिक भूमि पर सामान्य आवासीय बस्तियों के विकास की अनुमति नहीं होगी। हालांकि, निर्धारित प्रावधानों के तहत विशेष आवासीय टाउनशिप का प्रावधान अलग से हो सकता है।
इसके अलावा स्कूल, संक्रामक रोगों के अस्पताल, जेल, बड़े परिवहन टर्मिनल, थोक व्यापार, तेल डिपो, पेट्रोलियम एवं ज्वलनशील पदार्थों का भंडारण, गैस गोदाम, पशुपालन, डेयरी और कचरा पालन जैसी गतिविधियां प्रतिबंधित रहेंगी।
संशोधित नियमों में कृषि भूमि के उपयोग को लेकर भी कई प्रतिबंध स्पष्ट किए गए हैं। कृषि भूमि पर वाणिज्यिक परिसर और कुछ बड़ी परियोजनाओं के निर्माण की अनुमति नहीं होगी।
उच्च घनत्व वाली आवासीय योजनाओं और बड़े मॉल जैसी गतिविधियों पर भी रोक रहेगी। इसका मतलब यह है कि कृषि भूमि को सामान्य अनुमति व्यवस्था के आधार पर किसी भी गैर-कृषि गतिविधि के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।
नए नियमों से जमीन के उपयोग की प्रक्रिया में अधिक लचीलापन आने की संभावना है। अब किसी नई गतिविधि के लिए अनुमति वाली लंबी सूची में उसका नाम तलाशने की जरूरत कम होगी। यदि वह गतिविधि संबंधित भूमि उपयोग श्रेणी की प्रतिबंधित सूची में नहीं है, तो उसे सामान्य तौर पर अनुमति योग्य माना जाएगा।
इससे नए कारोबार, सेवाओं और बदलती शहरी जरूरतों के मुताबिक जमीन के उपयोग के विकल्प बढ़ सकते हैं।
हालांकि, Land Use की अनुमति को अन्य सभी मंजूरियों के बराबर नहीं माना जाएगा। भवन निर्माण की अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृति, अग्नि सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और अन्य संबंधित कानूनी प्रावधान जहां लागू होंगे, उनका पालन करना जरूरी होगा।
छत्तीसगढ़ में 1984 में लागू किए गए भूमि विकास नियमों में करीब चार दशक बाद यह बड़ा संशोधन किया गया है। नए प्रावधानों के जरिए आवासीय, वाणिज्यिक, औद्योगिक, कृषि, परिवहन, आमोद-प्रमोद और सार्वजनिक-अर्धसार्वजनिक भूमि उपयोग श्रेणियों में प्रतिबंधित गतिविधियों को स्पष्ट किया गया है।
अब इन संशोधनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि स्थानीय स्तर पर भूमि उपयोग, भवन निर्माण और अन्य जरूरी अनुमतियों की प्रक्रिया को किस तरह लागू किया जाता है।
